मध्य प्रदेश सरकार ने वन विभाग के कर्मचारियों को ड्यूटी के दौरान हथियारों के उपयोग के लिए कानूनी सुरक्षा प्रदान की है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब इन कर्मियों को पुलिस की तर्ज पर सुरक्षा मिलेगी।

मुख्य बिंदु

  • वन कर्मियों को अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218(2) के तहत सुरक्षा मिलेगी।
  • अब फायरिंग की घटना के बाद सीधे FIR के बजाय मजिस्ट्रेट जांच होगी।
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने 7 अगस्त को यह अधिसूचना जारी की।
  • यह निर्णय अवैध रेत खनन और वन्यजीव अपराधों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण है।

मध्य प्रदेश सरकार ने आखिरकार वन विभाग के कर्मचारियों को उनकी ड्यूटी के दौरान हथियारों के उपयोग के लिए कानूनी कवच प्रदान कर दिया है। यह मुद्दा वर्षों से लंबित था, लेकिन पिछले महीने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश के बाद सरकार को यह कदम उठाना पड़ा।

7 अगस्त को जारी अधिसूचना के अनुसार, इस सुरक्षा के दायरे में फॉरेस्ट गार्ड, फॉरेस्टर, डिप्टी रेंजर्स, रेंजर्स, असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स, डीएफओ और टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर शामिल हैं। अब इन अधिकारियों को उन कानूनी मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ेगा जो पहले उन्हें ड्यूटी के दौरान फायरिंग करने पर झेलनी पड़ती थीं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, अब तक वन कर्मियों और पुलिस/अर्धसैनिक बलों के बीच एक बड़ा कानूनी अंतर था। पुलिस कर्मियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218(2) के तहत सुरक्षा प्राप्त है, जिसका अर्थ है कि ड्यूटी पर फायरिंग होने पर सीधे आपराधिक मामला दर्ज करने के बजाय पहले एक मजिस्ट्रेट जांच (Inquest) की जाती है। इसके अभाव में, वन कर्मियों पर अक्सर हत्या के मुकदमे दर्ज किए जाते थे, जिससे उनका मनोबल गिरता था।

"वन कर्मियों को कानूनी सुरक्षा देना न केवल उनके मनोबल को बढ़ाएगा, बल्कि संगठित वन अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।"

विभागीय इन्वेंट्री में 12 बोर शॉटगन, 0.315 बोर राइफल्स और 0.32 बोर रिवॉल्वर जैसे हथियार शामिल हैं। हालांकि, अतीत में इन हथियारों का उपयोग विवादों से भरा रहा है। 2022 में विदिशा जिले के लातेरी में एक घटना हुई थी जहाँ वन कर्मियों की फायरिंग में एक युवक की मौत हो गई थी, जिसके बाद संबंधित रेंज ऑफिसर पर हत्या का मामला दर्ज किया गया था। इस घटना ने विभाग के भीतर गहरे असंतोष को जन्म दिया था।

विशेषता पुलिस/अर्धसैनिक बल वन विभाग (पुराना नियम) वन विभाग (नया नियम)
कानूनी सुरक्षा BNSS धारा 218(2) उपलब्ध उपलब्ध नहीं BNSS धारा 218(2) लागू
प्रक्रिया पहले मजिस्ट्रेट जांच सीधे FIR/हत्या का मामला पहले मजिस्ट्रेट जांच
हथियार श्रेणी प्रतिबंधित बोर (Automatic) गैर-प्रतिबंधित बोर गैर-प्रतिबंधित बोर
क्या आप जानते हैं?: पुलिस और सेना द्वारा उपयोग किए जाने वाले हथियार 'प्रतिबंधित बोर' के होते हैं, जिनका गोला-बारूद आम बाजार में उपलब्ध नहीं होता, जबकि वन विभाग के हथियार नागरिक लाइसेंस वाले बोर के होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या अब वन कर्मी बिना किसी जांच के फायरिंग कर सकते हैं?
नहीं, सुरक्षा का मतलब यह नहीं है कि फायरिंग की जांच नहीं होगी। इसका मतलब है कि सीधे FIR के बजाय पहले मजिस्ट्रेट द्वारा यह देखा जाएगा कि फायरिंग ड्यूटी के दौरान और कानूनन सही थी या नहीं।

2. यह निर्णय क्यों लिया गया?
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अवैध रेत खनन और वन्यजीव तस्करी जैसे गंभीर अपराधों से निपटने के लिए वन कर्मियों को कानूनी सुरक्षा देना आवश्यक है ताकि वे बिना डर के काम कर सकें।