केरळ के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने बेलगाव में बताया कि महाराष्ट्र के मुंबई में किए गए सीमा‑विवाद के प्रस्तावों को कानूनी विशेषज्ञों की मदद से अध्ययन कर उचित जवाब दिया जाएगा। राज्य की जमीन, जलधारा और आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए कोई समझौता नहीं होगा।
बेलगाव, 9 जुलाई 2026 – केरळ के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने आज सुवर्णा सौधा में पत्रकारों को बताया कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा मुंबई में आयोजित सभी‑पार्टी बैठक में उठाए गए सीमा‑विवाद के प्रस्तावों का राज्य सरकार द्वारा गहन अध्ययन कर जवाब तैयार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह कदम कानूनी विशेषज्ञों के परामर्श के बाद उठाया जाएगा।
पृष्ठभूमि: बेलगावी/बेलगाव विवाद की लंबी कहानी
केरळ और महाराष्ट्र के बीच बेलगावी (बेलगाव) क्षेत्र को लेकर दशकों से विवाद चला आ रहा है। 1960 में महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ, तब से ही इस क्षेत्र की भाषा, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को लेकर दोनों राज्यों में टकराव रहा। 2013 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस सीमा को लेकर दो‑तीन बार सुनवाई की, लेकिन अंतिम निर्णय अभी तक नहीं आया।
महाराष्ट्र की नई पहल: मुंबई में सर्वसम्मत बैठक
महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में मुंबई में एक सर्वसम्मत बैठक बुलाई, जिसमें राज्य के प्रमुख राजनैतिक नेता और प्रशासनिक अधिकारी भाग ले रहे थे। इस बैठक में "बेलगावी को महाराष्ट्र में मिलाना" के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई, जिससे केरळ सरकार को गंभीर चिंता हुई। शिवकुमार ने कहा कि उन्होंने इस बैठक की कार्यवाही को ध्यान से देखा और तुरंत अपने मंत्रियों, एम.बी. पाटिल तथा पूर्व मंत्री एच.के. पाटिल के साथ प्रारम्भिक चर्चा की।
केरळ सरकार की रणनीति
शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि राज्य के अधिकारी अब मुंबई में अपनाए गए प्रस्तावों का विस्तृत अध्ययन करेंगे। इस प्रक्रिया में कानूनी विशेषज्ञों, भू‑सर्वेक्षण विभाग और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों की मदद ली जाएगी। उनका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी प्रस्ताव में केरळ की भूमि, नदियों और स्वाभिमान के हितों को नुकसान न पहुँचाया जाए।
राजनीतिक एवं सामाजिक प्रभाव
सीमा विवाद का असर केवल दो राज्यों तक सीमित नहीं है; यह राष्ट्रीय राजनीति में भी तनाव का कारण बन सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर कई राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने मतदाताओं को आकर्षित करने के साधन के रूप में उपयोग कर रहे हैं। साथ ही, इस क्षेत्र के स्थानीय लोगों ने भी कई बार विरोध प्रदर्शन किए हैं, जिससे सामाजिक अस्थिरता बढ़ी है।
आगे का रास्ता: कानूनी और राजनयिक समाधान
शिवकुमार ने कहा कि केरळ सरकार न्यायालयीय उपायों के साथ-साथ राजनयिक वार्ता को भी प्राथमिकता देगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि राज्य के हितों की रक्षा के लिए सभी उपलब्ध साधनों का प्रयोग किया जाएगा, चाहे वह सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करना हो या केंद्र सरकार से मध्यस्थता का अनुरोध।
इस प्रकार, केरळ सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह महाराष्ट्र की किसी भी एकतरफा निर्णय को बिना उचित कानूनी और तथ्यात्मक जाँच के स्वीकार नहीं करेगी।