महाराष्ट्र विधान परिषद ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में महत्वपूर्ण संशोधनों को मंजूरी दी है, जिसमें निवारक हिरासत की अवधि को 24 घंटे से बढ़ाकर 30 दिन करने का प्रस्ताव है।

मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति और कानूनी व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। महाराष्ट्र विधान परिषद ने हाल ही में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में कई महत्वपूर्ण संशोधनों को पारित किया है। इन संशोधनों का सबसे विवादास्पद और महत्वपूर्ण पहलू निवारक हिरासत (Preventive Custody) की अवधि को बढ़ाना है। वर्तमान में, कानून के तहत किसी व्यक्ति को अपराध रोकने के उद्देश्य से 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, लेकिन प्रस्तावित संशोधन के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए 30 दिनों तक की हिरासत का आदेश दे सकेंगे।

प्रमुख संशोधनों का विश्लेषण

विधान परिषद द्वारा पारित इन संशोधनों में केवल हिरासत की अवधि ही नहीं, बल्कि कई अन्य महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान भी शामिल हैं:

  • जांच अधिकारियों का पद: धारा 15 के तहत, जांच के कुछ परिचालन कार्यों के लिए 'पुलिस अधीक्षक' (SP) के स्थान पर 'सहायक पुलिस आयुक्त' (ACP) के पद को शामिल करने का प्रस्ताव है, ताकि स्थानीय स्तर पर जांच प्रक्रिया अधिक सुलभ हो सके।
  • डिजिटल सामग्री पर नियंत्रण: धारा 98 के तहत, सरकार को अब समाचार पत्रों और पुस्तकों के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड (सोशल मीडिया और समाचार वेबसाइटों) को भी जब्त करने का अधिकार मिल सकता है, यदि वे राष्ट्र की अखंडता या सामाजिक सद्भाव को खतरे में डालते हैं।
  • अग्रिम जमानत में सख्ती: धारा 482 के तहत, अब अग्रिम जमानत चाहने वाले व्यक्ति को अंतिम सुनवाई और आदेश के दौरान अदालत में उपस्थित होना अनिवार्य होगा।

क्या राज्य केंद्र के कानून बदल सकता है?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, चूंकि 'आपराधिक कानून' भारतीय संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है, इसलिए राज्य सरकारों के पास केंद्र के कानूनों में संशोधन करने का अधिकार है। हालांकि, एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि राज्य के ये संशोधन केंद्रीय कानून के साथ सीधे टकराव में नहीं होने चाहिए। यदि अदालत को लगता है कि राज्य का कानून केंद्र के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, तो उसे रद्द किया जा सकता है।

विपक्ष का विरोध और राजनीतिक निहितार्थ

इन संशोधनों पर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने चिंता जताई है कि 24 घंटे की हिरासत को 30 दिन में बदलना पुलिस को राजनीतिक विरोधियों और प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाने का हथियार दे सकता है। वहीं, सत्ताधारी दल के नेताओं का तर्क है कि ये बदलाव कानून व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण पाने के लिए आवश्यक हैं।