बजट सत्र में कांग्रेस‑नेतृत्व वाली INDIA गठबंधन ने संविधान संशोधन बिल को रोका था, परन्तु अब कई विभाजन ने विपक्ष की ताकत घटा दी है। मानसून सत्र में NDA दो‑तिहाई बहुमत पाने की कोशिश करेगा, जबकि DMK का कदम संतुलन को बदल सकता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • विपक्ष के विभाजन से संसद में उसकी प्रभावशीलता घट गई है
  • NDA दो‑तिहाई बहुमत हासिल कर महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करने की तैयारी में है
  • DMK का समर्थन या विरोध मानसून सत्र के परिणाम को निर्णायक बना सकता है

बजट सत्र के अंत में कांग्रेस‑नेतृत्व वाली INDIA गठबंधन ने महिलाओं के आरक्षण को सीमांकन से जोड़ने वाले संविधान संशोधन बिल को रोक कर एक दुर्लभ जीत हासिल की। यह जीत 17 अप्रैल को हुई, जब 298 सांसदों ने बिल का समर्थन किया, परन्तु 352 के दो‑तिहाई बहुमत से कम रहने के कारण यह पारित नहीं हो सका। इस सफलता ने विपक्ष को एक क्षणिक उत्साह दिया, परन्तु अब मानसून सत्र की तैयारी के साथ वह उत्साह चिंता में बदल गया है।

विपक्ष के चार प्रमुख झटके

1. AAP का विद्रोह – 24 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल की अंबेडकर पार्टी के सात सांसदों ने राज्यसभा में भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया। यह कदम anti‑defection कानून के दायरे में नहीं आया, क्योंकि यह समूह कुल दस सांसदों में से दो‑तिहाई से अधिक था, जिससे AAP की शक्ति तीन तक घट गई।

2. तृणमूल कांग्रेस का विस्फोट – पश्चिम बंगाल में 15 साल तक सत्ता में रहे ममता बनर्जी की पार्टी में 20 सांसदों ने बैनर्जी परिवार के खिलाफ बगावत की और लोकसभा में भाजपा के साथ जुड़ने की घोषणा की। इस बगावत ने तृणमूल कांग्रेस को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया, जबकि कई राज्यसभा सदस्य भी इस्तीफा देकर अपने पद छोड़ने को मजबूर हुए।

3. शिवसेना का विभाजन – जून में उद्धव ठाकरे की शिवसेना के नौ सांसदों में से छह ने एखनाथ शिंदे के साथ मिलकर अपना समर्थन बदल दिया। यह दूसरा बड़ा आंतरिक विद्रोह था, जिससे उद्धव के पास पार्टी का नियंत्रण और प्रतीक दोनों ही खतरे में आ गए।

4. कांग्रेस‑DMK का अलगाव – तमिलनाडु में 2026 विधानसभा चुनाव में एम.के. स्तालिन की DMK ने हार का सामना किया, जबकि भाजपा‑AIADMK गठबंधन भी अपेक्षित जीत नहीं हासिल कर सका। इस परिणाम ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन को और अधिक अस्थिर कर दिया।

मनसन सत्र में क्या हो सकता है?

इन सभी घटनाओं के बाद, NDA को दो‑तिहाई बहुमत हासिल करने की रणनीति स्पष्ट हो गई है। गृह मंत्री अमित शाह को कांग्रेस ने “लोकसभा में दो‑तिहाई बहुमत तैयार करने” का आरोप लगाया है, जबकि वह विपक्षी दलों को तोड़‑फोड़ कर लोकतंत्र का “मजाक” बना रहा है, ऐसा भी कहा गया है। यदि भाजपा इस बहुमत को सुरक्षित कर लेती है, तो सीमांकन बिल सहित कई लंबित विधेयक जल्दी पारित हो सकते हैं।

दूसरी ओर, DMK के पास अभी भी एक निर्णायक भूमिका है। यदि वह अपने गठबंधन के साथ मिलकर या स्वतंत्र रूप से विरोध का स्वर उठाता है, तो NDA को आवश्यक दो‑तिहाई बहुमत हासिल करने में कठिनाई होगी। यह स्थिति भारतीय संसद में शक्ति संतुलन को पुनः परिभाषित कर सकती है।

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

विपक्ष के इस टुकड़े‑टुकड़े होने को केवल अस्थायी कमजोरी नहीं माना जा सकता; यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की एक कड़ी परीक्षा भी है। यदि DMK इस अराजकता को संतुलित कर सके तो संसद की शक्ति पुनः परिभाषित होगी, और भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की दिशा तय होगी।