नई दिल्ली में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के एक बेंच में एक याचिकाकर्ता ने न्यायाधीशों को चिल्लाते हुए कागज़ फेंका, जिससे कोर्ट में अस्थायी उथल-पुथल मची। सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत हस्तक्षेप किया और व्यक्ति को बाहर निकाल दिया। बेंच ने आगे किसी कार्रवाई का आदेश नहीं दिया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • उत्त प्रदेश के एटा से आए याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कागज़ फेंके
  • न्यायाधीशों को ‘श्री न्यायिक सेवक’ कहकर अभिव्यक्त किया
  • सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत स्थिति शांत की, कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई

नई दिल्ली – शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के बेंच जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे के सामने एक याचिकाकर्ता ने अनैतिक भाषा में न्यायाधीशों को संबोधित किया और कई दस्तावेज़ हवा में फेंके। इस घटना ने कोर्ट की शालीनता को क्षणिक रूप से बाधित किया, परन्तु सुरक्षा बलों ने तुरंत हस्तक्षेप कर व्यक्ति को बाहर निकाल दिया।

घटना का क्रम

याचिकाकर्ता ने बेंच के सामने प्रवेश करते ही पूछा, “क्या आप व्यक्तिगत पक्ष हैं, श्री प्रबल प्रताप?” जब न्यायाधीशों ने पुष्टि की, तो वह तुरंत “श्री न्यायिक सेवक, मैं एसीपी, विकासनगर, लखनऊ के विरुद्ध FIR दर्ज करने का आदेश देता हूँ” जैसी आपत्तिजनक भाषा में बोलना शुरू कर दिया। इसके बाद उसने एक कंपनी का नाम लेते हुए कहा कि वह राष्ट्रीय साइबरक्राइम सिंडिकेट चलाता है और “155 पृष्ठों की फ़ाइल में सब लिखा है” का हवाला दिया। अंत में वह अपने फ़ाइल से कुछ कागज़ निकाल कर “इन कागज़ों को सीजेआई को सौंपें” कहते हुए हवा में उछाल दिया।

सुरक्षा की त्वरित कार्रवाई

सुरक्षा स्टाफ ने तुरंत याचिकाकर्ता को कोर्ट रूम से बाहर निकाल दिया, जिससे सत्र के प्रवाह को पुनः स्थापित किया गया। बेंच ने इस व्यवहार को “असंगत और गैर‑संसदीय” कहा, परन्तु याचिकाकर्ता की स्थिति को देखते हुए किसी दंडात्मक कार्रवाई का आदेश नहीं दिया। बेंच के आदेश में कहा गया कि “हम याचिकाकर्ता की असभ्य भाषा को नज़रअंदाज़ करते हुए मामले को खारिज करते हैं”।

पिछले समान घटनाक्रम

यह घटना पिछले वर्ष के समान नहीं है, जब अधिवक्ता राकेश किशोर ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई पर जूता फेंकने का प्रयास किया था। उस समय भी जूता न्यायाधीश को नहीं लगा और कोर्ट ने प्रक्रिया जारी रखी। राकेश को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने बार से हटाया और भारतीय वकालत परिषद ने उनका लाइसेंस निलंबित कर दिया। दोनों घटनाएँ न्यायपालिका के प्रति बढ़ते असंतोष को प्रतिबिंबित करती हैं, लेकिन संस्थान ने अपनी वैधता को बनाए रखने के लिए कड़े सुरक्षा उपाय अपनाए हैं।

कानूनी और सामाजिक प्रभाव

ऐसे मामलों में अक्सर आपराधिक दण्ड के अलावा “सामाजिक मीडिया” में उभड़ते विवाद भी प्रमुख होते हैं। इस बार, एटावा से आए याचिकाकर्ता के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा हुई, परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने “प्राकृतिक मृत्यु” जैसी चुटीली टिप्पणी के साथ इस मुद्दे को हल्के में नहीं लिया। यह संकेत देता है कि न्यायपालिका सार्वजनिक असंतोष को नियंत्रित करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग जारी रखेगी, जबकि कोर्ट की गरिमा को संरक्षित करने के लिए सुरक्षा को प्राथमिकता देगी।