राज्य विरोधी नेता आर. अशोक ने कांग्रेस सरकार के स्थायी निवास प्रमाणपत्र (पीआरसी) प्रस्ताव को संविधान का उल्लंघन मानते हुए अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वोट देने की कोशिश बताया। भाजपा ने भी इस कदम को राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति बेपरवाही के रूप में निंदा की।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कांग्रेस का पीआरसी प्रस्ताव संविधान के विरुद्ध है, यह भाजपा का दावा है।
- आर. अशोक ने कहा, यह प्रस्ताव अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वोट देने का साधन है।
- भाजपा ने केंद्र को हस्तक्षेप और पीआरसी को रोकने की मांग की है।
कल मयसूर में आयोजित एक कार्यक्रम में, कर्नाटक विधानसभा के विपक्षी नेता आर. अशोक ने कांग्रेस सरकार के स्थायी निवास प्रमाणपत्र (PRC) प्रस्ताव को गंभीर संविधानिक उल्लंघन बताया। उनका तर्क था कि यह कदम विशेष तीव्र संशोधन (SIR) के दौरान अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वोट देने की सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया है, जिससे राज्य की राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
प्रस्ताव की पृष्ठभूमि
कर्नाटक में चल रहे विशेष तीव्र संशोधन (SIR) के कारण मतदाता सूची को पुनः जांचा जा रहा है। कांग्रेस‑शासन ने इस प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए PRC जारी करने की योजना बनाई, जिससे निवासियों को अपने अधिकारों का प्रमाण मिल सके। लेकिन विपक्ष का मानना है कि यह कदम राज्य सरकार को नागरिकता और निवास के मुद्दों में केंद्र की अधिकारिता से बाहर ले जाता है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366(2) के तहत केवल केंद्र को ही सौंपा गया है।
भाजपा का प्रतिरोध
राज्य भाजपा अध्यक्ष बी. वाई. विजेन्दर ने भी इस प्रस्ताव की तीव्र निंदा की और कहा कि राजस्व निरीक्षकों को PRC जारी करने का अधिकार देना राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति असंवेदनशीलता दर्शाता है। उन्होंने बताया कि भाजपा की एक प्रतिनिधि टीम जल्द ही राज्यपाल के पास जाएगी, ताकि इस कदम को रोकने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की जा सके।
आधार और आंकड़े
आर. अशोक ने यह भी उजागर किया कि भारत में लगभग दो करोड़ अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं, जिनमें से 20‑30 लाख कर्नाटक में रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में बेंगलुरु में 250 बांग्लादेशी नागरिकों को निर्वासन किया गया, और ऐसे प्रवासी मयसूर, कोडुगु और चिक्कमगलुरु जैसे जिलों में भी बसे हुए हैं। इस प्रकार के आंकड़े विपक्ष के लिए राजनीतिक लाभ का साधन बनते दिखते हैं, जिससे चुनावी रणनीति में प्रवासियों को वोट बैंक के रूप में देखा जाता है।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि केंद्र इस मुद्दे पर हस्तक्षेप नहीं करता, तो राज्य स्तर पर समान प्रस्ताव दोहराए जा सकते हैं, जिससे फेडरल ढांचे में तनाव बढ़ेगा। साथ ही, यह विवाद कर्नाटक की सामाजिक-राजनीतिक धारा को भी प्रभावित कर सकता है, विशेषकर जब राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकता के मुद्दे सार्वजनिक बहस का केंद्र बनते हैं।