कार्नाटक हाई कोर्ट ने सेंटुरी क्लब को सार्वजनिक प्राधिकरण मानते हुए सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के दायरे में लाया। 1913 में महाराजा ने दिया गया 7.5 एकड़ सरकारी जमीन अब कोर्ट के आदेश से सार्वजनिक निरीक्षण के अधीन होगी।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सेंचुरी क्लब को सार्वजनिक प्राधिकरण माना गया
- 7.5 एकड़ सरकारी जमीन मुफ्त में मिली
- RTI अधिनियम के तहत सार्वजनिक जांच लागू
कार्नाटक हाई कोर्ट ने बेंगलुरु स्थित सेंटुरी क्लब के विरुद्ध एक अपील को खारिज कर दिया और 2017 में राज्य सूचना आयोग (SIC) द्वारा जारी आदेश को बरकरार रखा, जिसमें क्लब को सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित किया गया था। यह फैसला RTI अधिनियम की धारा 2(ह) के तहत लिया गया, क्योंकि क्लब 7.5 एकड़ भूमि पर स्थापित है, जो पहले महाराजा नरसिंह राजावड़ोयर ने 1913 में नि:शुल्क प्रदान की थी।
पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ
सेंचुरी क्लब की स्थापना 1913 में महाराजा नरसिंह राजावड़ोयर और सर एम. विश्वेस्वराय ने की थी, ताकि बेंगलुरु के क्यूब्बन पार्क के मध्य में एक सामाजिक एवं खेल क्लब स्थापित किया जा सके। उस समय से ही क्लब को 7.5 एकड़ सरकारी जमीन बिना किराया या रॉयल्टी के प्रदान की गई। स्वतंत्रता के बाद भी यह जमीन राज्य सरकार के नियंत्रण में रही, जिससे क्लब को सरकारी समर्थन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मिला।
कानूनी तर्क और कोर्ट का निर्णय
सेंचुरी क्लब ने दावा किया कि वह एक निजी सदस्य क्लब है और सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है, इसलिए RTI अधिनियम के दायरे में नहीं आता। क्लब के वकील प्रशांत मुर्ति ने धारा 2(ह) के पहले भाग से बाहर रहने का तर्क दिया, जबकि अधिवक्ता एस. उम्पथी ने कहा कि बड़ी सरकारी जमीन का आवंटन ही पर्याप्त सार्वजनिक वित्तीय सहायता का संकेत है। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुना और यह निष्कर्ष निकाला कि जमीन का मुफ्त आवंटन राज्य की ओर से एक महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष वित्तीय सहायता है, जो क्लब को सार्वजनिक प्राधिकरण बनाती है।
प्रभाव और भविष्य की दिशा
क्लब को सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित करने से अब इसे RTI अधिनियम के तहत सूचना प्रदान करनी होगी, जिससे उसके वित्तीय लेन‑देनों, सदस्यता शुल्क और अन्य प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता आएगी। यह निर्णय निजी क्लबों के लिए एक मिसाल स्थापित करता है, जहाँ सरकारी समर्थन के आकार को देखते हुए सार्वजनिक जांच को लागू किया जा सकता है। भविष्य में इसी तरह के मामलों में अन्य निजी संस्थाओं को भी समान दायरे में लाया जा सकता है।
अंत में, कोर्ट ने कहा कि सदस्यता शुल्क की छोटी राशि भी इस बड़े सार्वजनिक समर्थन के सामने नगण्य है, और इसलिए क्लब को RTI के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण माना जाना उचित है।