जम्मू-कश्मीर के राज्यत्व की बहाली के लिए दिल्ली में आयोजित होने वाले बड़े प्रदर्शन से पहले, राष्ट्रीय कांग्रेस ने कांग्रेस, बीजेपी, एडीएफ आदि के प्रमुख नेताओं को आमंत्रित किया। ओमर अब्दुल्ला ने फेडरल ढांचे की रक्षा की बात दोहराई।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- राष्ट्रीय कांग्रेस ने मोनसून सत्र के पहले दिन दिल्ली में विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया।
- INDIA गठबंधन के 52 प्रमुख नेताओं को आमंत्रित कर व्यापक समर्थन मांगा गया।
- जम्मू‑कश्मीर के राज्यत्व व अनुच्छेद 370/35A की बहाली को केंद्र सरकार पर दबाव बनाया जाएगा।
जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने 11 जुलाई को जारी किए गए एक पत्र में कहा कि राष्ट्रीय कांग्रेस (एनसी) ने मोनसून सत्र के उद्घाटन दिन, अर्थात् 1 अगस्त को नई दिल्ली के जंतर मंतर में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किया है। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य राज्यत्व की बहाली और अनुच्छेद 370‑35A के तहत संविधानिक गारंटी को पुनः स्थापित कराना है।
पार्टी‑स्तरीय आमंत्रण और गठबंधन की रणनीति
एनसी ने इस अवसर पर कुल 52 प्रमुख व्यक्तियों को आमंत्रित किया, जिनमें कांग्रेस की सोनिया गांधी, मलिकरजून खरगे, राहुल गांधी, डॉ. एम.के. स्टालिन, अखिलेश यादव, लालू प्रसाद यादव, ममता बनर्जी, सी. जोसेफ विजय तथा जम्मू‑कश्मीर के कई स्थानीय नेता जैसे बी.जेपी के सत्या शर्मा, पीडीपी की मेहबूबा मुल्तानी, अपणी पार्टी के अल्ताफ बुखारी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के साजिद लोने, और मिर्वाज़ उमर फ़रूक शामिल हैं।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया
अक्टूबर 2024 में मुख्यमंत्री बने ओमर अब्दुल्ला ने लगातार केंद्र सरकार से राज्यत्व की पुनर्स्थापना की मांग की है। कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को अपनी प्राथमिकताओं में रखा, जबकि केंद्र सरकार ने अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है। यह विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि राज्य‑स्तर के नेताओं ने अब राष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थन जुटाने की कोशिश की है, ताकि केंद्र पर दबाव बढ़ाया जा सके।
मिरवाज़ फ़रूक और धार्मिक नेताओं की भूमिका
जम्मू‑कश्मीर के प्रमुख धार्मिक नेता मिरवाज़ उमर फ़रूक ने भी इस पहल का समर्थन किया, यह कहते हुए कि “जम्मू‑कश्मीर के लोगों के अधिकारों की बहाली के लिए सभी सच्चे प्रयास आवश्यक हैं”। उन्होंने यह भी कहा कि यह आंदोलन केवल राज्यत्व तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अनुच्छेद 370‑35A के तहत सभी अधिकारों की पुनर्स्थापना का व्यापक लक्ष्य होना चाहिए।
भविष्य की संभावनाएँ और संभावित परिणाम
यदि इस बड़े पैमाने पर आयोजित प्रदर्शन में विविध राजनीतिक दलों की भागीदारी सफल होती है, तो यह केंद्र सरकार को संविधानिक प्रतिबद्धताओं को निभाने के लिए मजबूर कर सकता है। विपक्षी दलों की एकजुट आवाज़ और नागरिक समाज का समर्थन इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर फिर से प्रमुख बना सकता है।