पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व संघर्ष तेज़ है; कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल और चरणजीत चन्नी के समर्थकों की दो घंटे की बैठक कोई समाधान नहीं ला पाई। प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को हटाने की मांग फिर से दोहराई गई, जबकि हाईकमान ने उन्हें बरकरार रखा।

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मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • बघेल-चन्नी की दो घंटे की बैठक बेनतीजा रही
  • राज्य अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को हटाने की मांग दोहराई गई
  • कांग्रेस हाईकमान ने वड़िंग को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाये रखने का निर्णय किया

पंजाब कांग्रेस के भीतर सत्ता‑संकट अभी भी ठंडा नहीं हुआ है। शनिवार को कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल ने पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों के साथ दो घंटे की बंद‑कमरे की बैठक की, लेकिन किसी ठोस समाधान तक पहुँचना असफल रहा। इस बैठक में कई वरिष्ठ नेता ने फिर से अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग दोहराई, जबकि बघेल ने हाईकमान के निर्णय को चुनौती देने से इनकार किया।

पार्श्वभूमि और इतिहास

पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर खींचतान कई महीनों से जारी है। 2024 में बघेल को प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया गया था, परन्तु चन्नी गुट ने वड़िंग की पुनः नियुक्ति को अनिच्छा के साथ देखा। इस विवाद का मूल कारण 2027 के विधानसभा चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए एकजुट, निर्णायक नेतृत्व की कमी माना जाता है। पहले भी पार्टी ने उच्च‑स्तरीय पुनर्गठन के प्रयास किए हैं, परन्तु गुट‑बांट के कारण स्थायी समाधान नहीं निकला।

बैठक के प्रमुख बिंदु

बैठक में चरणजीत सिंह चन्नी, पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा, ओपी सोनी, प्रताप सिंह बाजवा, परगट सिंह और कई वरिष्ठ कार्यकर्ता मौजूद थे। रंधावा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हमारी प्राथमिकता 2027 में कांग्रेस सरकार बनाना है; इसके लिए हमें मजबूत, समझौता‑न करने वाला नेता चाहिए।” बघेल ने कहा कि वह “पार्टी के सभी हितों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा हूँ, कोई भी हाईकमान के फैसले का विरोध नहीं कर रहा है।” वड़िंग की हटाने की मांग पर बघेल ने स्पष्ट इनकार किया, जिससे गुट‑बांट और गहरा हुआ।

हाईकमान का कदम और चुनावी प्रभाव

कांग्रेस राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने हाल ही में जारी नई सूची में वड़िंग को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष घोषित किया। यह कदम चन्नी‑गुट को असंतुष्ट कर रहा है, क्योंकि वे इसे “स्लिपर सेल” की तरह देखते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विभाजन को सुलझाने में पार्टी असफल रहती है, तो 2027 के चुनाव में भाजपा और शरण सिंह की नई गठबंधन को महत्वपूर्ण लाभ मिल सकता है। वहीं, यदि बघेल मध्यस्थता करके एक सर्वसम्मति वाले नेता को स्थापित कर पाते हैं, तो कांग्रेस को पुनः शक्ति‑संकलन का अवसर मिल सकता है।

आगे की संभावनाएँ

आगामी हफ्तों में बघेल को दोबारा हाईकमान के सामने गुट‑बांट की चिंताओं को पेश करना पड़ सकता है, या फिर एक नई नेतृत्व‑संरचना का प्रस्ताव देना होगा। पार्टी के भीतर के दबाव और बाहरी प्रतिस्पर्धा दोनों ही इस संघर्ष को तेज़ कर रहे हैं। इस बीच, प्रदेश के आम मतदाता इस अटकलों से थक चुके हैं और स्पष्ट, भरोसेमंद नेतृत्व की माँग कर रहे हैं।