कोलकाता में दो‑दिन की बैठक के बाद रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले विद्रोही समूह ने कई ममता बानर्जी के भरोसेमंद समर्थकों को अपने पक्ष में लाया। राज्य‑स्तर और ज़िला समितियों की स्थापना से पार्टी संरचना को सुदृढ़ किया गया, जिससे चुनाव आयोग को अपना प्रतीक और फंड्स पाने की रणनीति तैयार हो रही है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • रिताब्रता बनर्जी के समूह ने कई ममता समर्थकों को अपने पक्ष में लिया।
  • राज्य और ज़िला समितियों की स्थापना से पार्टी संरचना मजबूत हुई।
  • समूह चुनाव आयोग को अपना प्रतीक और फंड्स देने के लिए दलील तैयार कर रहा है।

त्रिनामूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर तीव्र विभाजन ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई उथल‑पुथल मचा दी है। रिताब्रता बनर्जी द्वारा संचालित विद्रोही समूह ने कोलकाता में दो‑दिन की विस्तृत बैठक के बाद कई प्रमुख ममता बानर्जी समर्थकों को अपने साथ जुड़ने का प्रस्ताव रखा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य चुनाव आयोग (ईसी) के सामने पार्टी का प्रतीक और फंड्स सुरक्षित करना है।

पृष्ठभूमि

टीएमसी के अंदर पहले से ही कई बार विभाजन देखे जा चुके हैं, परंतु रिताब्रता बनर्जी का समूह विशेष रूप से प्रभावशाली नेताओं को आकर्षित करने में सफल रहा है। फूड एवं फॉरेस्ट मंत्री के रूप में कार्य कर चुके ज्योति प्रियो मुल्लिक और बरहूम ज़िला के पूर्व अध्यक्ष अनुब्रता मंडोल ने इस समूह में शामिल होकर अपनी प्रतिबद्धता जताई। दोनों को ममता बानर्जी के निकटतम सहयोगी माना जाता था, जिससे यह कदम उनके राजनीतिक भविष्य में अहम मोड़ बन गया।

नए गठबंधन की घोषणा

बैठक के दौरान राज्य और ज़िला स्तर पर कई समितियों की स्थापना की घोषणा भी की गई। बिप्लब मीत्रा को राज्य अध्यक्ष और जावेद अहमद खान को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया। महिला मोर्चे के लिए सबिना यास्मिन को ट्रिनामूल महिला कांग्रेस राज्य प्रमुख और अल्पसंख्यक मोर्चे के लिये बहारुल इस्लाम को अध्यक्ष बनाया गया। इन नियुक्तियों से समूह की संगठनात्मक आधारभूत संरचना को तेज़ी से मजबूत करने का इरादा स्पष्ट है।

संरचनात्मक विकास

समूह ने राष्ट्रीय कार्यकारी समिति भी स्थापित की, जिसमें अरुप राय को अध्यक्ष के रूप में रखा गया, जबकि ममता बानर्जी को इस पद से हटाया गया। यह कदम पार्टी के भीतर सत्ता के पुनर्संरचन को दर्शाता है और ईसी को प्रस्तुत किए जाने वाले नामों की सूची को आधिकारिक बनाने में मदद करेगा।

राजनीतिक प्रभाव

यह विकास न केवल टीएमसी के भीतर शक्ति संतुलन को बदल रहा है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों में भी गहरा प्रभाव डालेगा। यदि इस समूह को ईसी से प्रतीक और फंड्स मिलते हैं, तो ममता बानर्जी के मूल दल के लिए वोटों का विभाजन और संसाधनों की कमी का जोखिम बढ़ेगा। साथ ही, राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा द्वारा पूर्व आरएस सांसदों को शामिल करने की रणनीति इस विभाजन को और जटिल बना सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की आंतरिक टकराव पार्टी की सार्वजनिक छवि को धूमिल कर सकती है, जिससे जनता के बीच वैकल्पिक विकल्पों की तलाश बढ़ेगी।