जम्मू‑कश्मीर में दो विवादित पुस्तकों के वितरण को लेकर तीन प्रकाशकों को गिरफ्तार किया गया, और उन्हें 10 दिनों के पूछताछ के लिए पुलिस हिरासत में भेजा गया। यह कदम राजनीतिक दलों और सार्वजनिक समूहों की पुस्तक‑विरोधी मांगों के बाद आया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • इन्दरपॉल सिंह, अमरदीप सिंह और गिरिश अरोरा को गिरफ्तार किया गया।
  • दो पुस्तकों को ‘विभाजनवादी प्रशंसा’ के आरोप में स्कूल लाइब्रेरी से हटाया गया।
  • जम्मू‑कश्मीर पुलिस ने 10‑दिन की पुलिस रिमांड दी, साथ ही कई आपराधिक धारा लागू की गईं।

जम्मू‑कश्मीर की एक जिला अदालत ने विपक्षी विचारधारा को बढ़ावा देने का आरोप लगने वाली दो पुस्तकों के प्रकाशकों को 10 दिनों के लिए पुलिस हिरासत में रहने की अनुमति दी। इस निर्णय के बाद, इन्दरपॉल सिंह (ओबेरॉय बुक सर्विस, जम्मू) और नोएडा‑आधारित डॉमिनेंट पब्लिशर्स के अमरदीप सिंह तथा गिरिश अरोरा को पुलिस ने हिरासत में ले लिया।

पुस्तकों का विवाद और राजनीतिक प्रतिक्रिया

‘पर्सनैलिटीज़ एंड लेजेंड्स ऑफ़ J&K’ तथा ‘ग्रेट पर्सनैलिटीज़ ऑफ़ जम्मू एंड कश्मीर’ नामक दो पुस्तकें, जिनके लेखक क्रमशः हिलाल अहमद‑संतोष मीना और सुशांत गिरी हैं, को सरकारी स्कूल लाइब्रेरी में वितरित किया गया था। विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा और कांग्रेस ने इन पुस्तकों को ‘विभाजनवादी आदर्शों को महिमामंडित’ करने का आरोप लगाया, जिससे राज्य सरकार ने पुस्तकें वापस ले लीं।

कानूनी कारवाई और लागू धारा

जिला पुलिस ने इस मामले में कई धाराएँ लागू कीं, जिनमें बैंकर (भेदभाव) एक्ट की धारा 49, 61(2), 152, 196, 353 और अनवैध गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम की धारा 13 शामिल हैं। इन धारा का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव और झूठी जानकारी के प्रसार को रोकना है। पुस्तकें हटाने के बाद, जम्मू‑कश्मीर पुलिस ने दो प्रकाशन गृहों पर जाँच की, जिससे 251 प्रतियों को बरामदा किया गया।

पार्श्वभूमि और संभावित प्रभाव

जम्मू‑कश्मीर में शिक्षा सामग्री की जाँच पहले भी कई बार विवाद का विषय रही है। 2024‑25 में भी कई पुस्तकें ‘विचारधारा के विपरीत’ होने के कारण हटाई गई थीं। इस बार, उच्च‑स्तरीय जांच का आदेश देकर सरकार ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा के परिप्रेक्ष्य में रख लिया है, जिससे भविष्य में शिक्षा सामग्री की स्वायत्तता पर प्रश्न उठ सकते हैं।

समाज और अभिप्राय

विरोधी समूहों ने इस कार्रवाई को ‘स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की रक्षा’ के रूप में सराहा, जबकि कई साहित्यिक संगठनों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की चेतावनी दी। यदि इस मामले में अदालत का अंतिम फैसला पक्ष में आता है, तो यह जम्मू‑कश्मीर में पुस्तक प्रकाशन के नियमन में नया मानक स्थापित कर सकता है।