कर्नाटक के सार्वजनिक सेवा आयोग (केपीएससी) के चेयरमैन शिवशंकरप्पा एस. साहुकर को उनके दो बेटियों को सरकारी पदों के लिए अवैध रूप से चयनित करने के आरोप में सस्पेंड किया गया। राज्यपाल थावर चंद गेहलोत ने इस कदम को निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करने के लिए उठाया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • केपीएससी चेयरमैन को बेटियों के अवैध चयन के आरोप में सस्पेंड किया गया।
  • राज्यपाल ने हितसंबंध का खुलासा न करने को गंभीर उल्लंघन बताया।
  • विचाराधीन जांच में सुप्रीम कोर्ट के तहत अनुच्छेद 371(1) का प्रयोग हो सकता है।

बेंगलुरु, 13 जुलाई 2026 – कर्नाटक के सार्वजनिक सेवा आयोग (केपीएससी) के चेयरमैन शिवशंकरप्पा एस. साहुकर को उनके दो बेटियों को सरकारी पदों के लिए अवैध रूप से चयनित करने के आरोप में राज्यपाल थावर चंद गेहलोत ने सस्पेंड किया। यह कदम राज्यपाल द्वारा हितसंबंध के खुलासे न करने और चयन प्रक्रिया में दखल देने के गंभीर आरोपों के बाद उठाया गया।

पृष्ठभूमि और नियमों का उल्लंघन

केपीएससी राज्य के विभिन्न विभागों में नियुक्तियों का प्रमुख निकाय है और इसके अध्यक्ष को सार्वजनिक हित के सर्वोच्च मानकों का पालन करना अनिवार्य है। 2002 के सरकारी आदेश के अनुसार, केपीएससी के अध्यक्ष के बच्चों को पिछड़े वर्ग (OBC) आरक्षण के तहत आवेदन करने का अधिकार नहीं है। फिर भी, साहुकर की बेटियों ने आय प्रमाणपत्र में वार्षिक आय को ₹40,000 तक सीमित कर OBC एवं क्रीमी लेयर छूट का दावा किया, जबकि वास्तविक आय इस सीमा से अधिक थी।

राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री की प्रतिक्रियाएँ

राज्यपाल ने कहा, “चेयरमैन ने न तो खुद को अलग किया और न ही हितसंबंध का औपचारिक खुलासा किया, जिससे चयन प्रक्रिया में अनुचित लाभ प्राप्त हुआ।” उन्होंने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 371(1) के तहत राष्ट्रपति को संदर्भित करने की सिफ़ारिश भी की। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवाकुमार ने स्पष्ट किया कि यह राज्यपाल का विवेकाधिकार है और अगले वरिष्ठ सदस्य को अस्थायी रूप से अध्यक्ष पद संभालने का आदेश दिया गया है।

कानूनी पहलू और संभावित प्रभाव

संबंधित शिकायतों के आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) पहले ही साहुकर की बेटी सुमा एस. साहुकर के खिलाफ दर्ज की गई थी, जो वाणिज्य एवं उद्योग विभाग में जूनियर इंजीनियर पद के लिए आवेदन कर रही थी। यदि जांच में यह साबित होता है कि चयन प्रक्रिया में धोखाधड़ी हुई, तो यह न केवल साहुकर को पद से हटाने बल्कि सार्वजनिक सेवा आयोग की विश्वसनीयता को भी गहरा झटका देगा।

भविष्य की दिशा

इस सस्पेंशन से कर्नाटक में सार्वजनिक नियुक्तियों की पारदर्शिता और जवाबदेही पर नई चर्चा शुरू होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएँ प्रशासनिक सुधारों को तेज़ कर सकती हैं, विशेषकर हितसंबंध के खुलासे और आरक्षण नियमों के कड़ाई से पालन को लेकर।