लद्दाख ने अप्रैल 2026 से दो जिलों से सात जिलों की संरचना अपनाई। केंद्र सरकार ने कस्टमाइज्ड अनुच्छेद 371 के तहत एक नई संघ क्षेत्रीय निकाय की योजना बनाई, जो सात पहाड़ी परिषदों के ऊपर विधायी, कार्यकारी, वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार रखेगी।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • लद्दाख अब सात जिलों में विभाजित होगा, जिससे स्थानीय प्रशासन में गहरा परिवर्तन आएगा।
  • कस्टमाइज्ड अनुच्छेद 371 के तहत एक नया संघ क्षेत्रीय निकाय स्थापित किया जाएगा, जो पहाड़ी परिषदों के ऊपर कार्य करेगा।
  • नई संरचना से क्षेत्रीय विकास, सामाजिक सहभागिता और वित्तीय नियोजन में सुधार की उम्मीद है।

लद्दाख, जो 2019 में भारत के 28वें संघीय क्षेत्र के रूप में स्थापित हुआ था, अब अपने प्रशासनिक मानचित्र को पुनः आकार दे रहा है। अप्रैल 2026 से दो जिलों (लेह और कारगिल) की जगह सात जिलों की नई सीमा लागू की जाएगी, जिससे स्थानीय शासन की पहुँच और प्रभावशीलता बढ़ेगी। इस परिवर्तन के पीछे मुख्य उद्देश्य दूरदराज़ और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले नागरिकों को बेहतर प्रतिनिधित्व और संसाधन उपलब्ध कराना है।

कस्टमाइज्ड अनुच्छेद 371 ढांचा

मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने बताया कि इस नई संरचना के तहत एक संघ क्षेत्रीय निकाय स्थापित किया जाएगा, जो विशेष रूप से लद्दाख के अनूठे सामाजिक‑आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखेगा। यह निकाय अनुच्छेद 371 के संशोधित प्रावधानों के तहत कार्य करेगा, जिससे वह सात पहाड़ी परिषदों के ऊपर विधायी, कार्यकारी, वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार रखेगा। इस मॉडल को पहले उत्तराखंड और आंध्र प्रदेश में लागू किए गए विशिष्ट अनुच्छेद 371 के अनुभवों से प्रेरित माना गया है।

पहाड़ी परिषदों की भूमिका

सात पहाड़ी परिषदें प्रत्येक नए जिले के भीतर स्थापित होंगी, जिससे स्थानीय विकास योजनाओं, बुनियादी ढाँचे के प्रोजेक्ट्स और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों की निगरानी स्थानीय स्तर पर की जा सकेगी। परिषदों को वित्तीय स्वायत्तता दी जाएगी, जिससे वे अपने बजट का प्रभावी उपयोग कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संरचना लद्दाख की विविध जातीय और सांस्कृतिक समूहों के बीच सामंजस्य बढ़ाने में सहायक होगी।

संभावित चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा

हालांकि नई प्रणाली के कई फायदे स्पष्ट हैं, लेकिन इसे लागू करने में प्रशासनिक क्षमताओं, मानव संसाधन और वित्तीय संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियाँ भी सामने आ सकती हैं। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों को मिलकर प्रशिक्षण, तकनीकी समर्थन और पारदर्शी निगरानी तंत्र स्थापित करना आवश्यक होगा। यदि इन बाधाओं को समय पर दूर किया गया, तो लद्दाख का यह मॉडल भारत के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में दोहराया जा सकता है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर स्थानीय शासन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।