सूरत नगर निगम ने 30 मई को नासिर नगर में लगभग 100 झोपड़ियों को ध्वस्त किया, जिससे कई परिवार बेघर हुए। कार्यवाही को चुनौती देते हुए 26 प्रभावित निवासियों ने हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया, जबकि निलंबित कार्यकारी अभियंता सुजल प्रजापति ने अपने निलंबन को रद्द करने की याचिका दायर की।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सूरत नगर निगम ने 30 मई को नासिर नगर में 100 से अधिक झोपड़ियों को ध्वस्त किया।
  • निलंबित कार्यकारी अभियंता सुजल प्रजापति ने निलंबन को चुनौती देने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
  • हाई कोर्ट ने नगरपालिका को सभी दावों को लिखित हलफ़नामा में प्रस्तुत करने का आदेश दिया।

गुजरात के सूरत में 30 मई को नासिर नगर के वें रोड क्षेत्र में निजी जमीन पर कब्ज़ा मानते हुए नगर निगम (SMC) ने लगभग सौ शरणार्थी झोपड़ियों को ध्वस्त किया। इस कार्रवाई से कई परिवारों को तत्काल बेघर होना पड़ा, जिससे स्थानीय स्तर पर तीव्र विरोध और कानूनी चुनौती उत्पन्न हुई।

पृष्ठभूमि और कानूनी लड़ाई

ध्वस्त किए जाने के बाद 26 प्रभावित निवासियों ने एक अलग दायरे में हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने नगर निगम की कार्रवाई की वैधता, पुनर्वास उपायों और जवाबदेही की माँग की। इस बीच, कार्यकारी अभियंता सुजल प्रजापति, जिन्हें उसी दिन निलंबित कर दिया गया था, ने भी एक अलग याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने अपने निलंबन को अनुचित बताया। प्रजापति ने व्हाट्सऐप संदेशों को प्रस्तुत किया, जिनमें उन्होंने बताया कि नगर आयुक्त ने उन्हें कार्य शीघ्र पूरा करने का निर्देश दिया था।

नगर निगम का रुख और उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप

SMC के प्रमुख एम. नगरजैन ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, क्योंकि मामला अभी भी “सबस जजिस” (sub judice) स्थिति में था। हाई कोर्ट ने मौखिक रूप से SMC को सभी प्रस्तुतियों को लिखित हलफ़नामा में दर्ज करने का निर्देश दिया, जिससे भविष्य में दस्तावेज़ी साक्ष्य के आधार पर निर्णय लिया जा सके।

आंतरिक जांच और निलंबन की प्रक्रिया

नगर आयुक्त के हलफ़नामे में यह बताया गया कि प्रारंभिक आंतरिक जांच ने पाँच अधिकारियों, जिनमें प्रजापति भी शामिल हैं, को निलंबित कर दिया, और एक गहन विभागीय जांच शुरू की गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि विस्थापित निवासियों को पुनर्वास किया जाना चाहिए और दोनों, आयुक्त और गुजरात सरकार, को अतिरिक्त हलफ़नामे प्रस्तुत करने को कहा गया।

विपक्षी वकील की दलीलें

प्रजापति के वरिष्ठ वकील आई.जी. जोशी ने तर्क दिया कि आयुक्त द्वारा भेजे गए संदेशों ने अभियंता को कार्य करने के लिए प्रेरित किया, जबकि आयुक्त बाद में यह दावा कर रहा है कि कोई आदेश नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो ध्वस्तीकरण जारी रहता और प्रजापति का निलंबन नहीं होता।

न्यायाधीश निराल मेहता ने दोनों पक्षों को सलाह दी कि सभी मौखिक दलीलों को लिखित हलफ़नामे में प्रस्तुत किया जाए, जिससे न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे। इस मामले की आगे की सुनवाई अभी जारी है, और नगर निगम तथा प्रभावित परिवारों के बीच पुनर्वास और जवाबदेही के मुद्दे मुख्य बिंदु बने हुए हैं।