नई सेंट्रल विंडो परियोजना के तहत दिल्ली के चार नेहरू‑कालीन सचिवालय भवनों को ध्वस्त करने का निर्णय लिया गया है। लागत‑संभाल और लुटियंस की वास्तु‑दृष्टि को बचाने के लिये इन इमारतों को केवल नौ मंजिलों तक ही सीमित रखा गया था।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • नवीन केंद्रीय सचिवालय के निर्माण हेतु चार निहिलीयन‑कालीन इमारतें गिराई जाएँगी।
  • निर्माण को अधिकतम 9 मंजिल तक सीमित किया गया, लागत‑संभाल और लुटियंस की दृष्टि को बचाने के लिये।
  • इनकी जगह नया कर्तव्य भवन बनेगा, जिससे दिल्ली की प्रशासनिक परिदृश्य बदल जाएगा।

दिल्ली के केंद्रीय सचिवालय परिसर में स्थित निर्माण भवन, उद्योग भवन, शास्त्री भवन और कृषि भवन को क्रमशः ध्वस्त करने का कार्य जारी है। ये इमारतें 1950‑60 के दशक में स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने के लिये, सीमित बजट में और लुटियंस व बेकर द्वारा डिजाइन किए गए उत्तर‑दक्षिण ब्लॉक के दृश्य को बाधित न करने के लिये, अधिकतम नौ मंजिलों तक सीमित रखी गई थीं।

पृष्ठभूमि और निर्माण का इतिहास

1947 में भारत की सरकार मुख्य रूप से उत्तर‑दक्षिण ब्लॉक में स्थित थी, जबकि अतिरिक्त अधिकारियों के लिये द्वितीय विश्व युद्ध‑कालीन शैटल्स का प्रयोग किया जाता था। 1952‑68 के बीच, केंद्रीय सार्वजनिक कार्य विभाग (CPWD) के मुख्य वास्तुकार श्रीधर कृष्ण जोलेकर ने चार प्रमुख इमारतों की योजना बनाई और उनका निर्माण करवाया। उनका उद्देश्य था आधुनिक प्रशासनिक भवन बनाना, परन्तु बजट‑सचेत इंजीनियरिंग की सीमाओं के कारण इमारतों की ऊँचाई को 11 फ़ुट की न्यूनतम मंजिल ऊँचाई तक सीमित किया गया।

आर्थिक और वास्तु‑राजनीतिक कारण

इन इमारतों के निर्माण में अनुमानित लागत लगभग 10 करोड़ रुपये थी, जो उस समय की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्नत सामग्री जैसे प्री‑स्ट्रेस्ड कंक्रीट या स्टील फ्रेम, हाई‑स्पीड लिफ्ट और एस्केलेटर के लिये विदेशी मुद्रा की आवश्यकता को टालता था। साथ ही, दिल्ली की जल‑स्तर की विशेषता ने गहरी नींव बनाना कठिन बना दिया। इस कारण CPWD ने टाउन प्लानिंग ऑर्गेनाइजेशन (TPO) की 20‑मंजिला इमारत की सिफ़ारिश को अस्वीकार कर लुटियंस की दृश्यात्मक अवधारणा की रक्षा की।

सेंट्रल विंडो परियोजना और भविष्य की योजना

2024 में लॉन्च किया गया सेंट्रल विंडो प्रोजेक्ट इन ऐतिहासिक इमारतों को ध्वस्त कर, नई कर्तव्य भवन (Kartavya Bhawan) के निर्माण की योजना बनाता है। यह नई इमारत आधुनिक प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अधिकतम 9‑मंजिला संरचना में विकसित होगी, जिससे लुटियंस‑बेकर की मूल दृश्यावली में न्यूनतम परिवर्तन हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव दिल्ली के शहरी परिदृश्य को पुनः परिभाषित करेगा, लेकिन साथ ही विरासत संरक्षण के प्रश्न को भी उठाता है।

संभावित प्रभाव और चुनौतियाँ

इमारतों के विध्वंस से हजारों सरकारी कर्मचारी अस्थायी रूप से स्थानांतरित होंगे, जबकि नई इमारत के निर्माण में पर्यावरणीय मंजूरी और सार्वजनिक विरोध की संभावना है। इतिहासकारों का तर्क है कि इन निहिलीयन‑कालीन संरचनाओं को केवल “अधिकतम 9 मंजिल” के नियम के तहत नष्ट करना, भविष्य में शहर के वास्तु‑स्मृति को कम कर सकता है। फिर भी, सरकार का तर्क है कि नई कर्तव्य भवन राष्ट्रीय प्रशासन को अधिक कुशल, टिकाऊ और तकनीकी रूप से उन्नत बनाएगा।