गुजरात के मोरबी जिले में 300 से अधिक गांवों के किसान 3.5 किमी की पदयात्रा करके जिला कलेक्टर के कार्यालय में 400% मुआवजा या किराया की मांग कर रहे हैं। यह आंदोलन एडीएनी एनर्जी की विशेष कंपनी द्वारा प्रस्तावित 756 kV ट्रांसमिशन लाइन के खिलाफ है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मोरबी किसानों ने 400% मुआवजा या किराया की मांग की
  • जेटपार में 756 kV ट्रांसमिशन लाइन के विरुद्ध विरोध
  • सरकार ने 4 जुलाई को जारी किए गए ग्रेवनेंस को अमान्य कहा

गुजरात के मोरबी जिले में मंगलवार को एक बड़े पैमाने पर पदयात्रा शुरू हुई, जिसमें 300 से अधिक गांवों के लगभग समान संख्या में पुरुष‑और‑महिला हिस्सा ले रहे थे। मार्च का प्रारम्भ महेंद्रनगर चौकड़ी से हुआ और यह 3.5 किमी लंबी दूरी पारी कलेक्टर कार्यालय में समाप्त हुई।

प्रमुख मांगें और कानूनी पृष्ठभूमि

किसान 756 kV डबल‑सर्किट लाइन के निर्माण को रोकने के लिये 400 % तक की भूमि मुआवजा या मासिक किराया की मांग कर रहे हैं। वे यह दावा कर रहे हैं कि टेलीग्राफ अधिनियम की धारा 10(d) के तहत न्यूनतम नुकसान के लिए पूर्ण मुआवजा दिया जाना चाहिए। साथ ही, रोड (Right of Way) के लिए गाँव‑स्तर, नगरीय और शहरी क्षेत्रों में बाजार मूल्य का 260 % तक भुगतान करने की माँग की गई है।

सरकारी निर्णय और विरोध का कारण

राज्य सरकार ने 4 जुलाई को ऊर्जा एवं पेट्रोकेमिकल विभाग द्वारा एक ग्रेवनेंस जारी किया, जिसमें ट्रांसमिशन टावर और केबल के लिये दोहरी बाजार दर (200 %) की घोषणा की गई थी। किसानों ने इस निर्णय को “अवैध” और “अस्वीकार्य” घोषित किया, क्योंकि वे मानते हैं कि यह कंपनियों के पक्ष में अत्यधिक पक्षपातपूर्ण है।

प्रदर्शन की विस्तृत रूपरेखा

मोरबी के जेटपार में एडीएनी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड की सहायक कंपनी ‘हळवड ट्रांसमिशन लिमिटेड’ द्वारा प्रस्तावित 246 किमी लंबी लाइन को लेकर किसानों ने पहले अनिश्चितकालीन हड़ताल भी की थी, जिसे बाद में ‘सत्याग्रह’ के रूप में पुनः शुरू किया गया। अब उन्होंने इस मुद्दे को सुलझाने के लिये जिला, तालुका और ग्राम पंचायत स्तर पर विभिन्न किसान समितियों की स्थापना की योजना बनाई है।

भविष्य की संभावनाएँ

यदि सरकार इस ग्रेवनेंस को बदलने में विफल रहती है, तो किसान न्यायिक कार्रवाई की संभावना को भी नहीं छोड़ रहे हैं। साथ ही, ट्रांसमिशन कंपनी को नुकसान की भरपाई, दुर्घटना बीमा, और 25 वर्ष बाद लाइन को हटाने की लागत भी वहन करनी पड़ेगी, जैसा कि किसानों ने अपने प्रस्ताव में कहा है। इस संघर्ष का परिणाम गुजरात में कृषि‑उद्योग संबंधी नीतियों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।