विपक्ष ने चुनाव आयोग के फ़ॉर्म‑6 में जो नया खंड जोड़ा गया, उसे मोदी सरकार के निजी अधिकार का विस्तार बताया। कांग्रेस और सीपीआई(एम) के सांसदों ने इस परिवर्तन को रद्द करने की मांग की है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- फ़ॉर्म‑6 में नया खंड बिना विधायी संशोधन के जोड़ा गया।
- कांग्रेस और सीपीआई(एम) इसे मोदी की व्यक्तिगत सत्ता का विस्तार मानते हैं।
- कानूनी विशेषज्ञों ने इसे अल्ट्रा‑वायर्स (अधिकृत सीमा से बाहर) बताया है।
नई दिल्ली – 14 जुलाई को विपक्ष ने भारतीय चुनाव आयोग (ईसी) पर फ़ॉर्म‑6 में किए गए परिवर्तन के लिए तीखा प्रहार किया। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने इस नए खंड को “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निजी साम्राज्य” कहकर आलोचना की, जबकि सीपीआई(एम) के सांसद जॉन ब्रिटास ने इसे कानूनी रूप से अमान्य घोषित कर वापसी की माँग की।
फ़ॉर्म‑6 में नया खंड क्या है?
फ़ॉर्म‑6, जो मतदाता पंजीकरण के लिए मुख्य दस्तावेज़ है, उसमें अब एक अनिवार्य घोषणा भाग जोड़ा गया है। यह भाग, ECINET पोर्टल पर ऑनलाइन भरते समय दिखता है, लेकिन डाउनलोड करने योग्य संस्करण में नहीं है। इसमें आवेदक या उनके माता‑पिता की अंतिम “सुपर इंटरेक्शन रजिस्टर” (SIR) के संबंध में जानकारी माँगी जाती है, जो चुनावी रिकॉर्ड‑कीपिंग के लिए नया मानदंड बनाता है।
कानूनी पहलू और अल्ट्रा‑वायर्स का आरोप
कांग्रेस और सीपीआई(एम) के सांसदों का तर्क है कि 1960 के रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स में कोई संशोधन किए बिना फ़ॉर्म‑6 में नया भाग जोड़ना असंवैधानिक है। ब्रिटास ने अपने पत्र में कहा कि “ऐसी कार्रवाई केवल कार्यकारी आदेश द्वारा उपनियम में परिवर्तन करती है, जो विधायी प्रक्रिया के बिना संभव नहीं है।” उन्होंने यह भी नोट किया कि किसी भी संशोधन के लिए न्याय विभाग की अधिसूचना और आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन आवश्यक है।
पिछले विवाद और संभावित प्रभाव
ईसी पर पिछले वर्षों में कई बार उसकी स्वतंत्रता और कार्यशैली को लेकर सवाल उठे हैं, विशेषकर 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद। इस नवीनतम परिवर्तन से मतदाता के डेटा संग्रह में संभावित दुरुपयोग, गोपनीयता उल्लंघन और चुनाव प्रक्रिया में पक्षपात की आशंकाएँ उठ रही हैं। यदि यह खंड जारी रहा, तो यह भविष्य में मतदान अधिकारों की वैधता पर सवाल उठाने का कारण बन सकता है।
आगे का रास्ता
विपक्ष ने ईसी से तुरंत इस खंड को हटाने और मौजूदा नियमों के अनुसार संशोधन करने की मांग की है। ईसी ने अभी तक इस आरोप पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन कानूनी चुनौतियों और सार्वजनिक दबाव के मद्देनज़र इसे पुनः समीक्षा करने की संभावना है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा के लिए इस मुद्दे पर निरंतर निगरानी आवश्यक होगी।