‘सतलुज’ फ़िल्म के हटाए जाने के बाद पंजाब के राजनीतिक दल, युवा संगठनों और धार्मिक संस्थाओं ने गाँव‑शहरों में खुलेआम स्क्रीनिंग आयोजित की है। यह पहल फिल्म के इतिहास‑विरोधी दावों को चुनौती देती हुई, पंजाब के अतीत की याद दिलाने का प्रयास है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • ‘सतलुज’ फिल्म को ZEE5 से हटाया गया, लेकिन गाँवों में सार्वजनिक दिखाया जा रहा है।
  • शिरोमणि अकाली दल, SGPC और कई युवा समूह इस स्क्रीनिंग में सक्रिय हैं।
  • फिल्म की सामग्री को लेकर सरकारी जांच और सेक्शन 69A के तहत कानूनी प्रश्न उठे हैं।

‘सतलुज’ फिल्म का विवाद जुलाई 3 को ZEE5 पर प्रीमियर होने के बाद ही प्लेटफ़ॉर्म ने इसे भारत के कैटलॉग से हटा दिया। फिल्म में 1980‑90 के दशक के आतंकवाद के दौरान जासवंत सिंह खलरा द्वारा उजागर की गई “बिना मुकदमे के दफ़नाई गईं” 25,000 शरीरों की कहानी बताई गई है। आधिकारिक ब्लॉक आदेश नहीं है, पर केंद्र सरकार की एक समिति ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के सेक्शन 69A के तहत जांच शुरू कर दी है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जासवंत सिंह खलरा, एक मानवाधिकार कार्यकर्ता, ने 1990 के दशक में पुलिस द्वारा गैर‑कानूनी दफ़न और जलाशयों में जलाए गए शवों के प्रमाण इकट्ठा किए। उनका निधन 1995 में गुप्त हत्याओं के बाद हुआ, जिससे इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा में नई ऊर्जा आई। ‘सतलुज’ ने इन घटनाओं को सिनेमा के माध्यम से उजागर करने की कोशिश की, पर फिल्म के प्रमाणिकता को लेकर कई पक्षों में मतभेद बना।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने कहा कि यह स्क्रीनिंग युवाओं को इतिहास की सच्चाई बताने के लिए है। SAD के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बडाल ने कहा, “पंजाबियों, विशेषकर सिखों को इस दर्दनाक दौर को याद रखने से रोका नहीं जा सकता।” इसी बीच केंद्रीय रेल एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री रवनीत सिंह बित्तु ने फिल्म निर्माताओं से “रचनात्मक स्वतंत्रता” के बहाने पर विवादास्पद दावों को इतिहास के रूप में पेश करने से बचने को कहा। उन्होंने आधिकारिक दस्तावेज़, न्यायिक रिपोर्ट और सत्यापित आँकड़े माँगे।

गाँव‑गाँव में सार्वजनिक स्क्रीनिंग

SGPC और अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के समर्थन से कई गुरुद्वारों के खुले मैदानों में बड़े प्रोजेक्टर लगाकर फिल्म चलायी जा रही है। दिब्रुगढ़ जेल में बंद सांसद अमितपाल सिंह के अनुयायियों ने भी इस पहल में सक्रिय भूमिका निभाई। दर्शकों के बीच 42 वर्षीय रन्दीप धिल्लों ने कहा, “यह फिल्म हमारे दिल को चीर गई; यह हमारे बीते हुए ‘काली दिनों’ की याद दिलाती है।” उन्होंने प्रतिबंध हटाकर नई पीढ़ी को सच्चाई दिखाने की मांग की।

कानूनी और सामाजिक प्रभाव

फिल्म के खिलाफ सेक्शन 69A के तहत जांच जारी है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन पर प्रश्न उठ रहे हैं। यदि कोर्ट फिल्म को प्रतिबंधित करती है तो यह सिख समुदाय के बीच और अधिक असंतोष उत्पन्न कर सकता है, जबकि यदि इसे मुक्त किया गया तो अन्य ऐतिहासिक विवादों के लिए समान दांव पर सवाल उठेंगे।

आगामी अरदास और संभावित परिणाम

अकल तख्त ने 14 जुलाई हरिके पटन पर सतलुज नदी के किनारे विशेष अरदास का आयोजन किया है, जिसमें खलरा द्वारा उजागर किए गए अनसुलझे मामलों की शांति के लिए प्रार्थना होगी। यह धार्मिक सभा राजनीतिक दबाव को कम करने और सामाजिक समेट को बढ़ावा देने का एक प्रयास माना जा रहा है।