नेशनल एग्जामिनेशन (NEET) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ सोनम वांगचुक द्वारा की गई अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल ने 18वें दिन प्रवेश किया है। स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते ही दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को तुरंत चिकित्सा मदद के लिए जवाब देने को कहा है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 18वें दिन पर है
- दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य से त्वरित चिकित्सा हस्तक्षेप की माँग की
- NEET और अन्य राष्ट्रीय परीक्षाओं में alleged irregularities पर जांच जारी
नेशनल एग्जामिनेशन (NEET) एवं अन्य प्रमुख परीक्षाओं में संभावित धांधली के आरोपों के खिलाफ प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। यह हड़ताल अब 18वें दिन पर पहुँच गई है, जबकि उसके स्वास्थ्य की स्थिति को लेकर चिंताएँ तेज़ी से बढ़ रही हैं।
पृष्ठभूमि और कारण
वांगचुक ने 2023 में पहली बार NEET में प्रश्नपत्र लीक और चयन प्रक्रिया में हेराफेरी के आरोप लगाए थे। उसके बाद, कई अन्य राष्ट्रीय परीक्षा संस्थानों में समान irregularities के संकेत सामने आए, जिससे व्यापक सार्वजनिक बहस छिड़ी। वांगचुक ने कहा कि इन अनियमितताओं को सुधारने के लिए केवल प्रशासकीय उपाय पर्याप्त नहीं हैं; उन्हें न्यायिक हस्तक्षेप और सार्वजनिक दबाव की जरूरत है।
हिंसा की निरंतरता और स्वास्थ्य जोखिम
हड़ताल के शुरू होने के बाद से, वांगचुक के शारीरिक स्वास्थ्य की स्थिति को लेकर कई डॉक्टरों और मानवाधिकार समूहों ने चेतावनी जारी की। उनकी उम्र (30 वर्ष) और लगातार पानी व भोजन न लेने की स्थिति को देखते हुए, अब उसकी स्थिति को “गंभीर” माना जा रहा है। इस कारण, कई चिकित्सा विशेषज्ञों ने तत्काल अस्पताल में भर्ती कर उपचार की सलाह दी है।
दिल्ली हाईकोर्ट की कार्रवाई
जैसे ही वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ती दिखी, दिल्ली हाईकोर्ट ने एक सार्वजनिक सुनवाई का आदेश दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली राज्य सरकार दोनों को एक याचिका के जवाब में “तत्काल चिकित्सा हस्तक्षेप” की मांग की। अदालत ने यह भी कहा कि यदि उचित उपचार नहीं दिया गया, तो यह मानवाधिकारों के उल्लंघन के समान हो सकता है।
संभावित परिणाम और आगे की राह
यदि कोर्ट का आदेश लागू हो जाता है, तो वांगचुक को सरकारी अस्पताल में भर्ती कर उपचार मिल सकता है, साथ ही उनके आरोपों की एक स्वतंत्र जांच भी शुरू हो सकती है। दूसरी ओर, यदि सरकार इस आदेश को टालती है, तो यह सार्वजनिक असंतोष को और बढ़ा सकता है और संभावित रूप से बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन को जन्म दे सकता है। इस मामले का विकास भारतीय न्यायिक प्रणाली और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन को भी उजागर करेगा।
वांगचुक की हड़ताल न केवल परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता को चुनौती देती है, बल्कि सामाजिक आंदोलन के स्वरूप, न्यायिक हस्तक्षेप और स्वास्थ्य अधिकारों के बीच जटिल संबंधों को भी दर्शाती है। इस समय, सभी पक्षों पर दबाव है कि वे मानवीय दायित्वों को प्राथमिकता दें और विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की दिशा में कदम बढ़ाएँ।