त्रिनामूल कांग्रेस ने केंद्र को चेतावनी दी कि अगर सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य में और गिरावट आती है तो सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। शिक्षा मंत्री धरमेंद्र प्रधान से संवाद की मांग की गई है, जबकि हड़ताल के 18वें दिन वांगचुक का वजन 8 किलोग्राम से अधिक घट गया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सोनम वांगचुक 18 दिन से उपवास कर रहे हैं, स्वास्थ्य अत्यंत नाज़ुक
  • त्रिनामूल कांग्रेस ने केंद्र को जिम्मेदार ठहराते हुए संवाद की मांग की
  • NEET और CBSE परीक्षा में धोखाधड़ी के आरोपों पर बड़े पैमाने पर छात्र विरोध

त्रिनामूल कांग्रेस के सांसद साकेत गोखले ने शिक्षा मंत्री धरमेंद्र प्रधान को लिखे पत्र में कहा कि यदि सोनम वांगचुक की स्थिति और बिगड़ती है तो केंद्र सरकार को उसका उत्तरदायित्व लेना पड़ेगा। वांगचुक, जो 28 जून से कोकरॉच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में उपवास कर रहे हैं, ने अपने स्वास्थ्य के बिगड़ने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है।

पृष्ठभूमि

वांगचुक की हड़ताल का कारण NEET और CBSE परीक्षाओं में कई बार उजागर हुई लीकेज और अनियमितताओं का आरोप है। छात्र संघों और कई सामाजिक समूहों ने इन मुद्दों को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया, जिससे शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने की मांग तेज़ हुई। इस संदर्भ में वांगचुक ने अपने आप को “सच्चे गांधी” के रूप में प्रस्तुत किया, जो लाखों छात्रों के भविष्य की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

हड़ताल की वर्तमान स्थिति

उपवास के 18वें दिन तक वांगचुक ने 8 किलोग्राम से अधिक वजन कम किया है और उन्हें लगातार चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है। उनका स्वास्थ्य “अत्यंत गंभीर” बताया गया है, जबकि उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखने की पुष्टि की है। इस बीच, कई विपक्षी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता ने उनके साथ एकजुटता जताई है, परंतु केंद्र सरकार की ओर से कोई ठोस संवाद नहीं हुआ है।

टीएमसी का जवाब

टीएमसी ने इस अवसर पर शिक्षा मंत्री को सार्वजनिक रूप से उत्तरदायी ठहराया है। गोखले ने पत्र में कहा कि “एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब प्रणाली विफल हो, तो जिम्मेदार मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए।” उन्होंने प्रधान को वांगचुक से सीधे संवाद करने और उनकी चिंताओं को समझने का आग्रह किया, यह कहा कि “सरकार की मौन स्थिति ही सबसे बड़ा अपमान है।”

संभावित परिणाम

यदि वांगचुक का स्वास्थ्य बिगड़ता है या अत्यधिक गिरावट आती है, तो यह भारत की शिक्षा नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाएगा। इस मुद्दे को हल करने के लिए सरकार को न केवल वैध संवाद स्थापित करना होगा, बल्कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा, यह मामला सामाजिक असंतोष को और बढ़ा सकता है और भविष्य में समान विरोधों को जन्म दे सकता है।