कोलकाता में बरुयपुर केस को लेकर आयोजित टीएमसी के विरोध मार्च के दौरान ममता बनर्जी ने एक कार्यकर्ता को थप्पड़ मारते हुए जनता का ध्यान खींचा। इस घटना ने राज्य की राजनीति में तनाव को और बढ़ा दिया, जबकि अदालत की अनुमति से मार्च चल रहा था।

कोलकाता के दक्षिणी हिस्से में बरुयपुर में घटित एक नाबालिग के बलात्कार‑हत्या मामले के विरोध में ट्राइना मोडल कांग्रेस (टीएमसी) की ममता बनर्जी के नेतृत्व में एक बड़ा मार्च आयोजित किया गया। इस मार्च को कलकत्ता हाई कोर्ट की अनुमति थी और यह बालीगंज पोस्ट से शुरू होकर हाज़रा क्रॉसिंग की ओर बढ़ रहा था।

मार्च के दौरान उत्पन्न हुआ उथल‑पुथल

मार्च के शुरू होते ही "चोर चोर" के नारे सुनाई देने लगे और बीजेडी व टीएमसी समर्थकों के बीच छोटे‑छोटे झड़पें सामने आईं। टीएमसी ने आरोप लगाया कि उसके कई कार्यकर्ताओं पर बीजेडी के लोगों ने हमला किया। इस बीच, भीड़ को शांत करने के प्रयास में ममता बनर्जी अपने कैलिगहाट स्थित घर से बाहर निकलीं, जहाँ उनके आसपास बड़ी भीड़ जमा थी।

विवादित थप्पड़ की घटना

भीड़ के बीच तनाव बढ़ते ही, ममता बनर्जी ने एक टीएमसी कार्यकर्ता को सार्वजनिक रूप से थप्पड़ मारते हुए दिखाया गया। इस दृश्य को सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के माध्यम से व्यापक रूप से देखा गया। कई दर्शकों ने इसे "नियंत्रण की कमी" और "भावनात्मक प्रतिक्रिया" के रूप में वर्णित किया, जबकि कुछ ने इसे सत्ता के निराशा के संकेत के रूप में पढ़ा।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और आरोप

घटना के बाद केंद्रीय मंत्री सुकांत मजुमदार ने ममता बनर्जी पर तीखा प्रहार किया, कहते हुए "बांग्लादेश में सत्ता से हटाए जाने के बाद उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया"। वहीं, ममता ने पुलिस को आलोचना करते हुए कहा कि बरुयपुर में हुए हिंसक घटनाओं के जिम्मेदार "उत्पीड़क" हैं और बीजेडी के गंदे कामों को उजागर किया। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही और बीजेडी के लोगों को मार्च में घुसने दिया।

भविष्य की संभावनाएँ और सामाजिक प्रभाव

बरुयपुर केस ने पहले ही महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर राष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठाए हैं। इस मार्च और ममता की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट हो रहा है कि राज्य में राजनीतिक तनाव और सामाजिक असंतोष दोनों ही गहराते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह की घटनाएँ दोहराई जाती हैं, तो सार्वजनिक भरोसा और लोकतांत्रिक संस्थानों की वैधता पर गंभीर असर पड़ सकता है। साथ ही, न्यायिक अनुमति के बावजूद भीड़ नियंत्रण में कमी से भविष्य में अदालत के आदेशों की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठ सकते हैं।

सभी पहलुओं को देखते हुए, यह घटना न केवल कोलकाता की राजनीति में एक मोड़ है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा और राजनीतिक प्रदर्शन के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती पेश करती है।