केंद्र सरकार ने राजस्थान के मंकारगढ़ धाम को 'राष्ट्रीय महत्व का स्मारक' घोषित करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिससे आदिवासी समुदायों में भारी आक्रोश है। सरकार का तर्क है कि आधुनिक निर्माण के कारण इसकी ऐतिहासिक अखंडता कम हो गई है।
मुख्य बातें
- केंद्र सरकार ने मंकारगढ़ धाम को 'राष्ट्रीय महत्व का स्मारक' घोषित करने से इनकार किया।
- सरकार का तर्क है कि आधुनिक विकास के कारण साइट की पुरातात्विक अखंडता समाप्त हो गई है।
- आदिवासी नेताओं ने इसे 1,500 बलिदानियों का अपमान बताया है।
- यह मुद्दा 'भिल प्रदेश' की मांग को और हवा दे सकता है।
संसद में हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए एक जवाब ने राजस्थान और पड़ोसी राज्यों के आदिवासी समुदायों के बीच एक बड़े राजनीतिक तूफान को जन्म दे दिया है। केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने स्पष्ट किया कि राजस्थान के बांसवाड़ा स्थित मंकारगढ़ धाम को 'राष्ट्रीय महत्व का स्मारक' घोषित करने की शर्तें पूरी नहीं होती हैं।
सरकार के अनुसार, 'प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम (AMASR), 1958' के तहत किसी स्थल को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा देने के लिए उसकी पुरातात्विक विशिष्टता और अखंडता का होना आवश्यक है। केंद्र का कहना है कि साइट पर हुए व्यापक आधुनिक निर्माण और विकास के कारण अब इसमें वह ऐतिहासिक शुद्धता नहीं बची है जो इस श्रेणी के लिए आवश्यक है।
क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक पुरातात्विक निर्णय नहीं है, बल्कि एक गहरा राजनीतिक और भावनात्मक मुद्दा है। मंकारगढ़ धाम को अक्सर 'आदिवासी जलियांवाला बाग' कहा जाता है, जहाँ 1913 में ब्रिटिश सेना ने लगभग 1,500 भील आदिवासियों की हत्या कर दी थी। यह स्थल राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी समुदायों की पहचान का केंद्र है।
मंकारगढ़ का मुद्दा केवल एक स्मारक का नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और उनके ऐतिहासिक संघर्ष की मान्यता का है।
आदिवासी नेताओं, विशेष रूप से भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के नेताओं ने इस निर्णय की कड़ी निंदा की है। सांसद राजकुमार रोत ने कहा कि सरकार का यह तर्क कि साइट की 'अखंडता' खत्म हो गई है, उन 1,500 बलिदानियों के प्रति अपमानजनक है जिन्होंने अपनी जान गंवाई थी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
17 नवंबर, 1913 को हुए मंकारगढ़ नरसंहार ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ा। यह घटना पंजाब के जलियांवाला बाग नरसंहार से छह साल पहले हुई थी। महान समाज सुधारक गोविंद गुरु के नेतृत्व में भील समुदाय ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाई थी, जिसके परिणामस्वरूप इस भीषण नरसंहार को अंजाम दिया गया था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. केंद्र सरकार ने मंकारगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक मानने से क्यों मना किया?
सरकार का कहना है कि आधुनिक निर्माण कार्यों के कारण साइट अपनी पुरातात्विक विशेषता और ऐतिहासिक अखंडता खो चुकी है।
2. मंकारगढ़ धाम का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
यह 1913 में हुए उस नरसंहार का स्थल है जहाँ ब्रिटिश सेना ने लगभग 1,500 भील आदिवासियों की हत्या कर दी थी।