शशि थरूर ने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के प्रस्ताव की कड़ी आलोचना करते हुए इसे संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए एक अस्तित्वगत खतरा बताया है। यह प्रस्ताव राज्यों की स्वायत्तता को कम कर सकता है और चुनावी जनादेश को विकृत कर सकता है।
मुख्य बातें
- 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' मॉडल संवैधानिक भावना और संसदीय प्रणाली के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
- यह राज्यों की स्वायत्तता को समाप्त कर केंद्र के प्रति अधीन कर सकता है।
- निश्चित चुनावी कार्यकाल से सरकारें अस्थिर हो सकती हैं और लोकतांत्रिक जवाबदेही कम हो सकती है।
पूर्व सांसद शशि थरूर ने हाल ही में 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' (ONOE) के विचार पर गहरा संदेह व्यक्त किया है। उनका तर्क है कि राष्ट्रीय और राज्य चुनावों के लिए एक समान समयसीमा लागू करना संसदीय प्रणाली की संरचनात्मक कार्यप्रणाली की गलत समझ है। यह कदम प्रशासनिक सुविधा को लोकतांत्रिक सार से ऊपर रखने जैसा है।
संसदीय लचीलापन बनाम कठोर चुनावी कैलेंडर
संसदीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह होती है। राष्ट्रपति प्रणाली के विपरीत, जहाँ कार्यकाल निश्चित होता है, भारत की संसदीय प्रणाली लचीली है। यदि कोई सरकार बहुमत खो देती है, तो लोकतांत्रिक पुनर्गठन आवश्यक है। एक निश्चित चुनावी कैलेंडर थोपने से यह जवाबदेही तंत्र बाधित होगा।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यदि चुनावी चक्र को कृत्रिम रूप से बांधा जाता है, तो यह 'लैम-डक' (कमजोर) सरकारों को जन्म दे सकता है। ऐसी सरकारें दीर्घकालिक नीति बनाने के बजाय केवल समय काटने पर ध्यान केंद्रित करेंगी, जिससे शासन की गुणवत्ता प्रभावित होगी।
'एक राष्ट्र, एक चुनाव मॉडल गणतंत्र की संवैधानिक भावना को कमतर करता है।'
संघीय ढांचे पर प्रहार
भारत राज्यों का एक संघ है। राष्ट्रीय और राज्य चुनावों को एक साथ मिलाकर, स्थानीय मुद्दों और राष्ट्रीय विमर्श के बीच की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं। इससे राष्ट्रीय दल, जिनके पास विशाल वित्तीय संसाधन और मीडिया प्रभाव है, क्षेत्रीय मुद्दों को दबा सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' का मुख्य तर्क क्या है?
उत्तर: समर्थक तर्क देते हैं कि इससे चुनाव खर्च में कमी आएगी और बार-बार चुनाव होने से होने वाली प्रशासनिक बाधाओं से बचा जा सकेगा।
प्रश्न 2: आलोचकों को इससे क्या डर है?
उत्तर: आलोचकों का मानना है कि यह राज्यों की स्वायत्तता को खत्म करेगा और राष्ट्रीय मुद्दों के सामने स्थानीय मुद्दों को गौण कर देगा।