श्रोमा चटर्जी की नई पुस्तक 'द मेल गेज़ रिडिफाइंड' भारतीय सिनेमा में महिलाओं के चित्रण का गहराई से विश्लेषण करती है, लेकिन समकालीन सिनेमा की अनदेखी के कारण यह कुछ हद तक पुरानी लगती है। यह पुस्तक क्लासिक फिल्मों के माध्यम से पितृसत्तात्मक नजरिए को समझने की कोशिश करती है।

मुख्य बातें

  • पुस्तक भारतीय सिनेमा के क्लासिक्स के माध्यम से 'मेल गेज़' (पुरुष दृष्टि) का विश्लेषण करती है।
  • श्रोमा चटर्जी ने सत्यजीत रे और श्याम बेनेगल जैसे दिग्गजों के कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया है।
  • समीक्षक के अनुसार, पुस्तक में आधुनिक (21वीं सदी) सिनेमा की कमी और कुछ विषयों का सीमित दायरा है।
  • यह मुख्य रूप से हिंदी और बंगाली सिनेमा तक सीमित है।

श्रोमा चटर्जी की नवीनतम कृति, 'द मेल गेज़ रिडिफाइंड' (The Male Gaze Redefined), भारतीय सिनेमा के इतिहास में महिलाओं के चित्रण और उन पर हावी पुरुष दृष्टिकोण का एक गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है। 'मदर इंडिया' और अन्य क्लासिक्स के माध्यम से, चटर्जी यह समझने का प्रयास करती हैं कि कैसे फिल्म निर्माता महिलाओं को पर्दे पर देखते और पेश करते हैं।

विषय वस्तु और सीमाएं

यह पुस्तक 1935 से 2000 के कालखंड पर केंद्रित है। चटर्जी ने सत्यजीत रे, मृणाल सेन और श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों के कार्यों का सूक्ष्म विश्लेषण किया है, जो मुख्य रूप से 'पैरेलल सिनेमा' या कला सिनेमा से जुड़े रहे हैं। हालांकि, पुस्तक की एक बड़ी चुनौती इसकी 'डेटेडनेस' या पुरानापन है। यद्यपि यह 2026 में प्रकाशित हो रही है, लेकिन इसका विश्लेषण काफी हद तक 20वीं सदी के अंत तक ही सिमटा हुआ है।

BozokMedia विश्लेषण: क्यों यह चर्चा महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण है। जब हम 'मेल गेज़' की बात करते हैं, तो हम केवल दृश्य की नहीं, बल्कि उस शक्ति संरचना की बात कर रहे होते हैं जो तय करती है कि महिला पात्रों को कैसे दिखाया जाए। चटर्जी का काम इस शक्ति संरचना को उजागर करने का एक सराहनीय प्रयास है, भले ही वह आधुनिक व्यावसायिक सिनेमा के बड़े हिस्से को छोड़ देती हैं।

सिनेमा में महिलाओं का चित्रण केवल कहानी का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह समाज में उनकी स्थिति और एजेंसी को परिभाषित करने वाला एक राजनीतिक उपकरण है।

पुस्तक में एक विसंगति यह भी है कि यह मुख्य रूप से हिंदी और बंगाली फिल्मों पर केंद्रित है, जिससे दक्षिण भारतीय सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा विश्लेषण से बाहर रह जाता है। साथ ही, यह 'मेनस्ट्रीम' या बड़े बजट की मसाला फिल्मों में व्याप्त पुरुषवादी दृष्टिकोण पर बहुत कम चर्चा करती है।

तुलनात्मक अध्ययन: कला सिनेमा बनाम मुख्यधारा सिनेमा

विशेषताकला/पैरेलल सिनेमा (पुस्तक का फोकस)मुख्यधारा/कमर्शियल सिनेमा (छूटा हुआ हिस्सा)
निर्देशन शैलीसत्यजीत रे, श्याम बेनेगल (प्रगतिशील)बड़े बजट के मसाला निर्देशक
महिला चित्रणजटिल और अक्सर संवेदनशीलअक्सर वस्तुकरण या रूढ़िवादी
सामाजिक प्रभावबौद्धिक विमर्शव्यापक जनमानस पर प्रभाव
क्या आप जानते हैं?: 'मेल गेज़' (Male Gaze) शब्द का प्रयोग पहली बार फिल्म सिद्धांतकार लौरा मुल्वे ने किया था, जो बताती हैं कि कैमरा अक्सर महिलाओं को पुरुष दर्शकों की संतुष्टि के लिए एक वस्तु के रूप में देखता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. यह पुस्तक किन फिल्मों पर आधारित है?
यह 'मदर इंडिया', 'गाइड' और 'देवदास' जैसी क्लासिक फिल्मों के साथ-साथ विभिन्न निर्देशकों के सिनेमाई दृष्टिकोण पर आधारित है।

2. समीक्षक ने पुस्तक की आलोचना क्यों की है?
समीक्षक का मानना है कि पुस्तक 21वीं सदी के आधुनिक सिनेमा और दक्षिण भारतीय सिनेमा के चित्रण में पीछे रह गई है।