भौतिक विज्ञानी आर. राजारामन ने 1960 के दशक में अमेरिका का निमंत्रण ठुकरा कर भारत लौटने का फैसला किया और परमाणु सुरक्षा के लिए जीवन समर्पित किया। उनका सफर, एक युवा विद्वान से लेकर भारत के प्रमुख नीतिनिर्माता तक, विज्ञान और सामाजिक सेवा के संगम को दर्शाता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- रजराज़रमन ने 1960 के दशक में भारत लौट कर शैक्षणिक सेवा चुनी
- उन्होंने परमाणु हथियारों के खतरों पर शुरुआती लेख लिखे
- प्रिंस्टन में ओप्पेनहाइमर के साथ काम करने के बाद भी उन्होंने भारत में ही योगदान दिया
आर. राजारामन, जो 1939 में कोयंबटूर में जन्मे, एक ऐसे समय में भारत लौट आए जब देश ने अभी तक अपना पहला परमाणु परीक्षण नहीं किया था। कॉर्नेल विश्वविद्यालय से हंस बेथे के मार्गदर्शन में डॉ.ट्रांसजेंडर थिसिस पूरा करने के बाद, उन्होंने अमेरिकी विज्ञान संस्थानों में आकर्षक करियर का प्रस्ताव प्राप्त किया, लेकिन सामाजिक सेवा की गहरी इच्छा ने उन्हें भारत की ओर खींचा।
प्रारम्भिक संघर्ष और भारतीय मूल की पुकार
1963 में, 24 वर्ष की आयु में, राजारामन को एक ग्रीन कार्ड मिला—अमेरिका में स्थायी निवास का दस्तावेज़—पर उन्होंने इसे वापस कर दिया। यह कदम उस समय असाधारण था; अधिकांश भारतीय वैज्ञानिक इस अवसर को नहीं छोड़ते थे। उनका मानना था कि यदि ग्रीन कार्ड रखेंगे तो विदेश यात्रा की आदत फिर से बन सकती है, जिससे उनका देशभक्ति का संकल्प कमजोर हो जाएगा।
शिक्षा, शोध और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन
भारत लौटकर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया और बाद में कई भारतीय संस्थानों—जैसे जेएनयू, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय—में अपना ज्ञान बाँटा। 1970 में, जब भारत ने अभी तक अपना पहला परमाणु परीक्षण नहीं किया था, राजारामन ने “परमाणु हथियारों के खतरों” पर एक प्रभावशाली लेख प्रकाशित किया, जिससे उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा में नैतिक आयाम जोड़े। 1998 में भारत ने दूसरा परमाणु परीक्षण किया, जिसके बाद राजारामन ने प्रिंस्टन के प्रोग्राम ऑन साइंस एंड ग्लोबल सिक्योरिटी से जुड़कर दक्षिण एशिया में शांति और सुरक्षा परियोजना में योगदान दिया।
दर्शन और विज्ञान का संगम
भौतिकी के साथ-साथ राजारामन ने दार्शनिक विचारों में भी गहराई से रुचि ली। वे रामचंद्र गांधी के करीबी मित्र थे और उनके साथ कई दार्शनिक चर्चाओं में भाग लेते थे। उनके नोटबुक में कियरकेगार्ड की उद्धरणें और व्यक्तिगत टिप्पणियाँ आज भी उनकी बौद्धिक जिज्ञासा की गवाही देती हैं।
विरासत और आज का महत्व
2007 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका योगदान आज भी भारत की परमाणु नीति और शैक्षणिक परिदृश्य में महसूस किया जाता है। पार्किन्सन रोग से जूझते हुए भी वे जेएनयू में प्रोफेसर इमेरिटस के रूप में सक्रिय रहे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनका जीवन सेवा और विज्ञान के प्रति अडिग प्रतिबद्धता का उदाहरण है।