हैदराबाद में आयोजित #StandWithHer पैनल ने बताया कि अभिभावकों को बचपन से ही समानता, सम्मान और सहमति पर बात करनी चाहिए। लड़कों को सीमाओं का सम्मान और अपनी कमजोरियों को व्यक्त करना सिखाना भविष्य में लैंगिक विषमताओं को कम कर सकता है।
मुख्य बिंदु
- अभिभावकों को बाल्यावस्था में समानता, सम्मान और सहमति पर बात करनी चाहिए।
- लड़कों को सीमाओं का सम्मान करना और अपनी कमजोरियों को व्यक्त करना सिखाएँ।
- डिजिटल उपकरणों से दूर रहकर बच्चों के साथ सार्थक संवाद करें।
हैदराबाद में डॉ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय के WeHub में आयोजित छठी #StandWithHer पैनल चर्चा में अभिभावकों को समानता, सम्मान और सहमति के मूल सिद्धांत सिखाने के महत्व पर प्रकाश डाला गया।
तेरावती अधिकारी चारु सिन्हा ने कहा कि अभिभावकों को प्रतिक्रियात्मक से सक्रिय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि बच्चे बिना निर्णय के भावनाएँ व्यक्त कर सकें।
अभिनेत्री अमला अक्किनेनी ने बताया कि शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को सही‑गलत की पहचान और परिणामों की समझ विकसित करनी चाहिए। फिल्म निर्देशक वी. नंदिनी रेड्डी ने नियमों के पीछे के कारणों को समझाने की सलाह दी।
उद्यमी उत्तम रेड्डी ने डिजिटल गैजेट्स को हटाकर बच्चों के साथ गहन बातचीत करने की आवश्यकता पर बल दिया। हायडराबाद विश्वविद्यालय की समाजशास्त्र प्रोफेसर अनुरेखा चारि वैघ ने कहा कि सहमति केवल लड़कियों को नहीं, बल्कि लड़कों को भी “ना” सुनना सिखाना चाहिए।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि पारिवारिक वार्तालापों में समानता और सहमति को शामिल करना भविष्य में लैंगिक हिंसा को कम कर सकता है और सामाजिक संतुलन को मजबूत कर सकता है।
“जब घर में ही समानता की नींव रखी जाती है, तो समाज में बदलाव संभव होता है।” – सामाजिक मनोवैज्ञानिक डॉ. रवींद्र सिंह
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या लड़के भी सहमति के बारे में सीख सकते हैं?
उत्तर: हाँ, उन्हें “ना” सुनना और व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करना सिखाया जाना चाहिए।
प्रश्न 2: अभिभावक डिजिटल स्क्रीन समय को कैसे सीमित कर सकते हैं?
उत्तर: निर्धारित समय‑सीमा बनाकर और परिवारिक गतिविधियों को प्राथमिकता देकर।