कन्नियाकुमारी के 26 वर्षीय पैराटैक्वोंडो खिलाड़ी ई. ब्लेसिंग साजु ने दो लगातार एशियाई चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीते, फिर भी राज्य सरकार से नौकरी और औपचारिक मान्यता का इंतजार कर रहे हैं। उनके संघर्ष और उपलब्धियों को देख कर खेल नीति में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- ई. ब्लेसिंग साजु ने 10वीं और 11वीं एशियाई पैराटैक्वोंडो चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीते।
- वह दो हाथों के बिना जन्मे हैं, फिर भी स्वतंत्र जीवन और शिक्षा पूरी की।
- सरकारी नौकरी और राज्य स्तर पर औपचारिक मान्यता अभी भी अधूरी है।
ई. ब्लेसिंग साजु, 26 वर्ष के पैराटैक्वोंडो खिलाड़ी, ने लगातार दो एशियाई पैराटैक्वोंडो चैम्पियनशिप (मलेशिया 2024 और मंगोलिया 2025) में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया। उन्होंने K41 पुरुष –63 किग्रा वर्ग में प्रतिस्पर्धा की और दोनों बार शीर्ष पर पहना।
पृष्ठभूमि और शुरुआती जीवन
साजु का जन्म कन्नियाकुमारी के सराल विलै गाँव में दो हाथों के बिना हुआ था, फिर भी उन्होंने सामान्य जीवन जीने का दृढ़ संकल्प अपनाया। स्थानीय स्कूल से स्नातक होने के बाद उन्होंने कुमराकॉइल स्थित नूरुल इस्लाम सेंटर फॉर हायर एजुकेशन से बी.कॉम की डिग्री प्राप्त की। 22 वर्ष की आयु में फुटबॉल में अपनी ड्रिब्लिंग कौशल के लिए सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने के बाद, चेन्नई के कोच सुमिथ कुमार ने उनकी वीडियो देखी और उन्हें टैकोडो की ओर प्रेरित किया।
खेल में उन्नति और चुनौतियां
कोच सिधेश्वरन के मार्गदर्शन में चार साल की कठोर प्रशिक्षण के बाद, साजु ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कदम रखा। हालांकि, मंगोलिया में आयोजित एशियाई पैराटैक्वोंडो चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए आवश्यक यात्रा एवं उपकरण खर्च एक बड़ा बाधा बना। इस समय कन्नियाकुमारी के सांसद विजय वसंत ने उन्हें लगभग ₹4.5 लाख की आर्थिक सहायता प्रदान की, जिससे वह इस महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिता में भाग ले सके।
मान्यता की कमी और भविष्य की उम्मीदें
स्वर्ण पदक जीतने के बावजूद, साजु ने राज्य सरकार और खेल विभाग से पर्याप्त मान्यता न मिलने की शिकायत दर्ज की। उनके पिता एलियास एक दैनिक मज़ूर हैं, जो रबर लेटेक्स संग्रहित करते हैं। इस आर्थिक पृष्ठभूमि को देखते हुए, साजु ने खेल कोटा के तहत सरकारी नौकरी की आशा जताई, जिससे परिवार को स्थायी आय का भरोसा मिल सके।
भारत में पैरास्पोर्ट्स का व्यापक संदर्भ
भारत ने हाल के वर्षों में पैरास्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें शुरू की हैं, परन्तु आधारभूत संरचना, रोजगार और मान्यता की कमी अभी भी प्रमुख चुनौतियां बनी हुई हैं। साजु जैसे खिलाड़ियों की कहानियां यह दर्शाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीतने के बाद भी, राष्ट्रीय स्तर पर उचित समर्थन नहीं मिलने से कई प्रतिभाओं का भविष्य अनिश्चित रह जाता है।
साजु की कहानी न केवल व्यक्तिगत दृढ़ता का प्रमाण है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सरकार को खेल नीति में सुधार, विशेषकर पैरास्पोर्ट्स के लिए, आवश्यक है। अगर उचित रोजगार और सार्वजनिक मान्यता प्रदान की जाए, तो यह न केवल एक खिलाड़ी के जीवन को बदल देगा, बल्कि भारत में समावेशी खेल संस्कृति को भी सुदृढ़ करेगा।