चीन की ‘लाइनशाइन’ सुपरकम्प्यूटर के 2.198 एक्साफ्लॉप प्रदर्शन ने दिखाया कि बिना विदेशी तकनीक के भी स्वदेशी क्षमताएँ वैश्विक मानक तक पहुँच सकती हैं। भारत के सेमीकंडक्टर मिशन से सीखते हुए, लेख बताता है कि रणनीतिक स्वायत्तता के लिए गहन पारिस्थितिकी तंत्र, डिज़ाइन कौशल और दीर्घकालिक निवेश अनिवार्य हैं।
जून 23 को अंतरराष्ट्रीय सुपरकम्प्यूटिंग सम्मेलन में एक अज्ञात नाम वाली मशीन ने विश्व की सबसे बड़ी रैंकिंग को चौंका दिया। शेनज़ेन स्थित लाइनशाइन ने 2.198 एक्साफ्लॉप्स का प्रदर्शन किया, जो अमेरिका के एल कैपिटन को 20 प्रतिशत से पीछे छोड़ गया। यह पहला चीनी सिस्टम है जिसने केवल सामान्य‑उद्देश्य CPU पर 2 एक्साफ्लॉप्स को पार किया और पूरी तरह से घरेलू स्टैक पर निर्भर है।
चीन की स्वायत्तता की राह
चीन ने 2022 के अक्टूबर में अमेरिकी निर्यात नियंत्रणों के बाद, अपनी चिप सप्लाई चेन को स्वयं पूरा करने के लिए तीव्र प्रयास शुरू किया। 2024 तक केवल 33 प्रतिशत स्वदेशी चिप कवरेज था, लेकिन 2030 तक 80 प्रतिशत का लक्ष्य है। TrendForce के अनुसार, 2026 तक चीनी AI‑चिप बाजार का आधा हिस्सा घरेलू निर्माताओं द्वारा पूरा किया जाएगा। यह प्रगति न केवल प्रौद्योगिकी में, बल्कि उपकरण, सामग्री और वास्तुकला में भी चीन की गहराई को दर्शाती है।
भारत के लिए सबक
भारत का सेमीकंडक्टर मिशन 2021 में 76,000 करोड़ रुपये के निवेश के साथ शुरू हुआ, जिसमें 13 परियोजनाएँ सात राज्यों में शामिल हैं। दत्ता–पावरचिप फाब, 91,000 करोड़ रुपये का निवेश, 50,000 वेफर प्रति माह का उत्पादन लक्ष्य रखता है, और 2028 तक पहला सिलिकॉन तैयार करने की उम्मीद है। लेकिन लेख बताता है कि फाब सिर्फ एक टुकड़ा है; वास्तविक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ डिज़ाइन, IP और सॉफ्टवेयर में निहित है। भारत पहले से ही NVIDIA, Intel, Qualcomm और Texas Instruments के R&D केंद्रों का मेजबान है, जो फैबलेस मॉडल के तहत तेज़ लाभ ला सकता है। साथ ही, 700,000 इंजीनियरों की कौशल कमी को देखते हुए, तेज़ प्रशिक्षण और प्रतिभा विकास अनिवार्य है।
भू‑राजनीतिक असर
वाशिंगटन की रोकथाम नीति ने चीन को वैकल्पिक समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया, जिससे वैश्विक स्टैक दो अलग-अलग इकोसिस्टम में विभाजित हुआ। भारत के लिए यह एक अवसर है: यदि वह अपनी स्वायत्तता और अंग्रेज़ी‑भाषी लाभों को सही तरीके से उपयोग करता है, तो यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए एक वैकल्पिक आपूर्ति चैनल बन सकता है।
निष्कर्ष
लाइनशाइन की सफलता केवल चीन की जीत नहीं, बल्कि यह सन्देश है कि एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाली सरकार, जब उसे सर्वश्रेष्ठ उपकरणों से वंचित किया जाता है, तो वह पर्याप्त और प्रतीकात्मक रूप से सक्षम समाधान बना सकती है। भारत को यह स्पष्ट संदेश मिल रहा है कि सिलिकॉन में संप्रभुता सतत निवेश, स्वदेशी IP और कुशल इंजीनियरों के साथ ही संभव है, न कि केवल सब्सिडी पर निर्भर।