भारत का 2047 तक 100 GW लक्ष्य हासिल करने के लिए स्वदेशी तकनीक, लागत प्रतिस्पर्धा और कड़ाई से सुरक्षा मानकों को मिलाकर एक रणनीतिक योजना जरूरी है। विदेशी आयात की तुलना में घरेलू निर्मित रिएक्टरों की आर्थिक और रणनीतिक लाभ स्पष्ट हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भारत ने स्वदेशी तकनीक से विश्व में सबसे सस्ते परमाणु रिएक्टर बनाए हैं।
  • 2047 तक 100 GW क्षमता हासिल करने के लिए सार्वजनिक‑निजी साझेदारी आवश्यक है।
  • सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए नई कंपनियों को चरणबद्ध रूप से विस्तार करना चाहिए।

भारत ने 1974 में शांति पूर्ण परमाणु परीक्षण के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना किया, जिससे स्वदेशी समाधान विकसित करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। 2008 में भारत‑अमेरिका सिविल परमाणु समझौते ने यूरेनियम आयात को आसान बनाया, लेकिन महँगे विदेशी रिएक्टरों की कीमतें भारत को आत्मनिर्भरता की राह पर ले गईं।

स्वदेशी तकनीक का आर्थिक लाभ

परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) और भारतीय कंपनियों के सहयोग से 200 MW से 500 MW तक रिएक्टर आकार बढ़ाया गया, और अब 700 MW यूनिट्स विकसित हो रही हैं। घरेलू रिएक्टर की लागत लगभग $1,700 / kW है, जो दक्षिण कोरिया ($2,200), फ्रांस ($5,500) और अमेरिका ($15,000) से कई गुना कम है। यह लागत अंतर भारत को संभावित निर्यातकर्ता बनाता है, यदि रणनीतिक रूप से सही कदम उठाए जाएँ।

नए प्रवर्तकों के लिए अवसर और चुनौतियाँ

सरकार ने 2047 तक 100 GW क्षमता हासिल करने के लिए सार्वजनिक‑निजी मॉडल अपनाया है। नई कंपनियों को घरेलू PHWR तकनीक अपनाकर लागत‑प्रतिस्पर्धी परियोजनाएँ शुरू करनी चाहिए, जबकि विदेशी लाइट‑वॉटर रिएक्टर (LWR) पर निर्भरता जोखिम बढ़ा देती है। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) भी भविष्य की ऊर्जा मांग, विशेषकर AI डेटा सेंटरों के लिए, संभावित विकल्प हो सकते हैं, परन्तु उनका व्यावसायिक प्रयोग अभी प्रारंभिक चरण में है।

सुरक्षा को प्राथमिकता

परमाणु सुरक्षा भारत की प्रमुख उपलब्धियों में से एक है। इतिहास ने दिखाया है कि एक भी गंभीर दुर्घटना सार्वजनिक विश्वास को क्षीण कर सकती है – जैसे चेरनोबिल के बाद पश्चिमी देशों में परमाणु ऊर्जा का ठहराव। इसलिए नई कंपनियों को पहले कुछ ही प्लांट्स के साथ विश्वसनीयता स्थापित करनी चाहिए, और बड़े पैमाने पर विस्तार से पहले सुरक्षा मानकों की कठोर समीक्षा करनी चाहिए।

भविष्य की दिशा

भारत को स्वदेशी LWR तकनीक विकसित करने के लिए पर्याप्त संसाधन और दीर्घकालिक योजना चाहिए, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु आपूर्ति समूह (NSG) की प्रतिबंधात्मक नीति इसे निर्यात से रोकती है। यदि इस दिशा में निवेश किया गया, तो भारत न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ भी बनाएगा।