करनाल जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी को आदेश दिया है कि वह 10 साल पुराने डीजल वाहन का दुर्घटना क्लेम न देने के कारण कार मालिक को ₹96,000 का भुगतान करे। आयोग ने बीमा कंपनियों द्वारा पॉलिसी जारी करने के बाद बहाने बनाने की प्रवृत्ति की कड़ी निंदा की है।

करनाल, हरियाणा: उपभोक्ता संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करते हुए, करनाल जिला उपभोक्ता आयोग ने एक बीमा कंपनी को कार मालिक को कुल ₹96,000 का भुगतान करने का निर्देश दिया है। यह मामला तब उठा जब बीमा कंपनी ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में 10 साल से पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध का हवाला देते हुए एक वैध दुर्घटना बीमा क्लेम को खारिज कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद का कारण

शिकायतकर्ता के पास 2012 मॉडल की हुंडई एलांट्रा (Hyundai Elantra) डीजल कार थी, जिसे मार्च 2024 में 'द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड' से बीमा कराया गया था। जून 2024 में, एक दुर्घटना के दौरान कार एक बिजली के खंभे से टकरा गई, जिससे वाहन को भारी नुकसान हुआ। कार मालिक ने अधिकृत वर्कशॉप से मरम्मत करवाई और ₹2.89 लाख का बिल जमा किया। हालांकि, बीमा कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम देने से मना कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के नियमों के अनुसार, NCR में 10 साल से पुराने डीजल वाहन चलाना प्रतिबंधित है।

उपभोक्ता आयोग की सख्त टिप्पणी

अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों नीरू अग्रवाल एवं सर्वजीत कौर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए बीमा कंपनी के तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब बीमा कंपनी ने वाहन के दस्तावेजों और उसकी आयु की पूरी तरह से जांच करने के बाद प्रीमियम स्वीकार किया और पॉलिसी जारी की, तो वह बाद में नियमों का हवाला देकर जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती।

आयोग ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, "आजकल बीमा कंपनियों में एक प्रवृत्ति देखी जा रही है कि वे झूठे आश्वासन देकर पॉलिसी जारी करती हैं और जब दावा (claim) किया जाता है, तो बहाने बनाने लगती हैं।"

आदेश का विवरण और उपभोक्ता अधिकार

आयोग ने बीमा कंपनी को निम्नलिखित भुगतान करने का आदेश दिया है:

  • ₹60,888: वास्तविक मरम्मत और क्लेम राशि के हिस्से के रूप में।
  • ₹25,000: मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजा।
  • ₹11,000: मुकदमेबाजी (litigation) की लागत के रूप में।

यह फैसला उन सभी वाहन मालिकों के लिए एक सबक है जो बीमा कंपनियों की सेवा में कमी (deficiency in service) का सामना कर रहे हैं। यह स्पष्ट करता है कि यदि कोई कंपनी प्रीमियम लेती है, तो उसे अनुबंध की शर्तों और नियमों के प्रति जवाबदेह होना होगा।