बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2013 में नासिक में एक इंजीनियरिंग छात्र के अपहरण‑हत्या मामले में दो आरोपीों की मौत की सजा को 30 साल की कठोर जेल में बदल दिया। न्यायाधीशों ने कहा कि यह मामला "सबसे दुर्लभ" श्रेणी में नहीं आता, इसलिए मृत्युदंड नहीं लगाया गया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- दो आरोपियों की फांसी को 30 साल के कठोर कारावास में कम किया गया
- न्यायालय ने कहा कि मामला "सबसे दुर्लभ" नहीं है
- रैनसम के लिए अपहरण, फिर हत्या, लेकिन मृत्युदंड नहीं
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक विभाजन बेंच के निर्णय में चेतेन पगारे और अमन जाट की मृत्युदंड को 30 वर्षों के कठोर कारावास में परिवर्तित किया। यह फैसला 25 जून 2022 को नासिक के विशेष अदालत द्वारा दी गई मृत्युदंड को उलटता है, जहाँ दो युवाओं को 2013 के किडनैप‑हत्या केस में सजा सुनाई गई थी।
केस का पृष्ठभूमि
जून 2013 में 22‑वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र विपिन बफ़ना ने नासिक के एक नृत्य वर्ग में भाग लेने के बाद घर नहीं लौटे। उसके परिवार ने देर रात एक फोन प्राप्त किया, जिसमें उसने बताया कि वह एक मित्र के घर रात्रि व्यतीत करेगा। अगले दिन वह नहीं मिला, और परिवार ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की। जांच में पता चला कि पगारे और जाट ने विपिन को अपहरण कर ₹1 करोड़ की फिरौती की मांग की थी। जब माँग पूरी नहीं हुई, तो उन्होंने युवक को मारकर शरीर को दूरस्थ स्थान पर विस्थापित कर दिया।
न्यायालय का तर्क
जज भारती दांग्रे और जज मंजुशा देशपांडे ने फैसला लिखा कि यद्यपि अपराध घोर है, लेकिन यह "सबसे दुर्लभ" (rarest of rare) मानदंड को नहीं पूरा करता, जो भारत में मृत्युदंड के प्रयोग को सीमित करता है। उन्होंने कहा कि दोनों आरोपी 25 और 22 वर्ष की आयु में थे, और उन्होंने पेशेवर हत्यारे की तरह कार्य नहीं किया; यह अधिकतर धन‑लूट की इच्छा से प्रेरित था।
दंड की अनुपातिकता
हाई कोर्ट ने यह दोहराया कि दंड का उद्देश्य न केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि भविष्य में समान अपराधों को रोकना भी है। इसलिए, सख्त लेकिन जीवन भर न होने वाले कारावास को उचित माना गया। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपियों के खिलाफ पहले के कई मामलों में उन्हें सजा नहीं मिली थी, परंतु इस मामले में उनका कोई पूर्व रिकॉर्ड नहीं था।
भविष्य की संभावनाएँ
यह फैसला भारत में मृत्युदंड के उपयोग पर एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है, विशेषकर जब अपराध की प्रकृति को "सबसे दुर्लभ" के मानदंड से तुलना की जाती है। कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के निर्णय से भविष्य में न्यायालयों में मृत्युदंड के दायरे को और संकीर्ण किया जा सकता है, जिससे दंड प्रणाली में अधिक समानता और अनुपातिकता आएगी।