माद्रास उच्च न्यायालय ने 44‑वर्षीय विवेक सरावणमुठु के पक्ष में निर्णय दिया, जिनका जन्म श्रीलंका में हुआ और भारत में पले‑बढ़े। 2026 में दूतावास द्वारा जारी पासपोर्ट सौंपने के नोटिस को अदालत ने 22 जुलाई तक स्थगित किया, और उन्हें श्रीलंका की नागरिकता प्राप्त करने के लिए नौ महीने का समय दिया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भारत के पासपोर्ट नवीनीकरण के बाद नोटिस जारी, जिसे अदालत ने रोका।
- पेटीशनकर्ता का जन्मस्थान कोलंबो, श्रीलंका, और भारतीय नागरिकता पर सवाल।
- माद्रास उच्च न्यायालय ने 9 महीने का समय दिया, ताकि श्रीलंका की नागरिकता प्राप्त की जा सके।
माद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश मोहम्मद शैफिक ने 44‑वर्षीय विवेक सरावणमुठु के पक्ष में निर्णय दिया, जिनका जन्म श्रीलंका में हुआ, परंतु भारत में पले‑बढ़े और 2014 से यू.एस. में रह रहे हैं।
विवेक ने 2004 में भारतीय पासपोर्ट के लिए आवेदन किया, जब उनके पास श्रीलंका का जन्म प्रमाणपत्र नहीं था। 2024 में उन्होंने कोलंबो का जन्म प्रमाणपत्र प्राप्त कर उसे अमेरिकी नागरिकता और इमिग्रेशन सर्विसेज़ (USCIS) के सामने जमा किया, जिससे उन्हें ग्रीन कार्ड मिला।
पासपोर्ट विवाद की पृष्ठभूमि
भारत के पासपोर्ट को नागरिकता के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि केवल यात्रा दस्तावेज़ के रूप में देखने के बहस के बीच, विवेक का मामला विशेष महत्व रखता है। 2025 में पासपोर्ट नवीनीकरण के समय उन्होंने स्पष्ट रूप से अपना वास्तविक जन्मस्थान बताकर भारतीय दूतावास को सूचित किया।
अदालत का निर्णय और आगे की कार्रवाई
अदालत ने दूतावास द्वारा जारी “पासपोर्ट सौंपें” नोटिस को 22 जुलाई 2026 तक स्थगित करने का आदेश दिया और विदेश मंत्रालय को विस्तृत प्रतिपत्र जमा करने का निर्देश दिया। 9 महीने का समय देकर, विवेक को श्रीलंका की नागरिकता प्राप्त करने का अवसर मिला, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘स्टेटलेस’ न बने।
यह निर्णय नागरिकता, पासपोर्ट और अंतरराष्ट्रीय कानून के जटिल संगम को उजागर करता है, और यह स्पष्ट करता है कि सही दस्तावेज़ीकरण और समय पर सुधार से ‘स्टेटलेस’ स्थिति से बचा जा सकता है।