कोलकाता हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों के बावजूद बच्चा दोनों माता‑पिता के प्रेम और देखभाल का हक़दार है। 16‑साल की बेटी के मामले में न्यायालय ने विज़िटेशन अधिकारों की समय‑समय पर समीक्षा की महत्त्वपूर्ण जरूरत पर जोर दिया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- बच्चे को दोनों माता‑पिता का प्यार मिलने का संवैधानिक अधिकार है।
- विज़िटेशन अधिकारों की समीक्षा उम्र और भावनात्मक विकास के अनुसार की जानी चाहिए।
- कोलकाता हाई कोर्ट ने मौजूदा वर्चुअल विज़िटेशन को जारी रखने का आदेश दिया।
कोलकाता हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया, जिसमें यह कहा गया कि वैवाहिक झगड़ों के कारण बच्चे को किसी भी एक माता‑पिता की देखभाल से वंचित नहीं किया जा सकता। यह फैसला जस्टिस दिनेश कुमार शर्मा ने सुनाया, जो पारिवारिक मामलों में बच्चों के अधिकारों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक मील का पत्थर माना गया।
पृष्ठभूमि और मामला
विवाह 2006 में विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत हुआ था और 2010 में एक बेटी का जन्म हुआ। 2016 में तलाक के दौरान पारिवारिक समझौते में माँ को अभिभावक अधिकार दिया गया, जबकि पिता को साप्ताहिक विज़िटेशन का अधिकार मिला। 2020 में पिता को हर शनिवार वीडियो‑कॉनफ़्रेंस के माध्यम से बेटी से मिलने की अनुमति मिली, लेकिन 2022 में माँ ने इस व्यवस्था को रद्द करने की याचिका दायर की, यह दावा करते हुए कि यह बच्चे की भावनात्मक स्थिति को प्रभावित कर रहा है।
न्यायालय का विश्लेषण
न्यायालय ने कहा कि बच्चे की “भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक” ज़रूरतें उम्र के साथ बदलती हैं और विज़िटेशन अधिकार “डायनामिक” होते हैं। 10‑साल की उम्र से 16‑साल तक पहुँचने पर बच्चे की भावनात्मक परिपक्वता में अंतर आता है, इसलिए अदालत को हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर पुनः मूल्यांकन करना चाहिए।
जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “विवाह के बीच में उत्पन्न विवादों के बावजूद, बच्चे को दोनों माता‑पिता के प्रेम और देखभाल का अधिकार है।” इस सिद्धांत ने न्यायालय को मौजूदा वर्चुअल विज़िटेशन को रविवार शाम 6‑7 बजे जारी रखने का निर्देश दिया और पिता को नई आवेदन दायर करने की अनुमति दी।
भविष्य की संभावनाएँ
यह निर्णय न केवल इस विशिष्ट मामले में बल्कि सम्पूर्ण देश में पारिवारिक कानून के प्रवर्तन में एक मानक स्थापित करता है। यह संकेत देता है कि भारतीय न्यायालय बच्चे के कल्याण को प्राथमिकता देते हुए पारिवारिक विवादों को सीमित रखेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की गतिशील समीक्षा भविष्य में अधिक लचीले, बच्चे‑के‑हित‑के‑आधारित आदेशों को जन्म देगी।
अंततः, माँ‑पिता दोनों को यह सुनिश्चित करना होगा कि अपने-अपने अधिकारों के प्रयोग में बच्चे के भावनात्मक विकास में बाधा न आए, जिससे एक स्वस्थ और संतुलित पारिवारिक माहौल बना रहे।