मदुरै में मद्रास हाई कोर्ट ने 2019 में हुए एसएस कॉलोनी हिरासत मृत्युदंड के मामले में दोषी पुलिसकर्मियों की सजा को निलंबित करने की याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस घटना को संस्थागत विफलताओं के परिणामस्वरूप बताया, न कि व्यक्तिगत अपराध के रूप में।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- मद्रास हाई कोर्ट ने चार पुलिसकर्मियों की सजा निलंबित करने की याचिकाओं को खारिज किया।
- जाँच में 17‑वर्षीय मुग़ु कार्थिक की शव पर 25 पूर्व‑मृत्यु चोटें पाई गईं, जो हिरासत में यातना का प्रमाण हैं।
- अदालत ने इस मामले को व्यक्तिगत दोष नहीं, बल्कि कई स्तरों पर संस्थागत विफलता के रूप में वर्गीकृत किया।
मदुरै के मद्रास हाई कोर्ट ने 16 जुलाई 2026 को चार पुलिसकर्मियों की सजा निलंबित करने की याचिकाओं को अस्वीकार कर दिया, जिन्होंने 2019 में एसएस कॉलोनी में 17‑वर्षीय मुग़ु कार्थिक की हिरासत में अत्याचार कर उसकी मृत्यु कर दी थी। यह निर्णय न्यायिक प्रणाली में गहरी संस्थागत कमियों को उजागर करता है, जो अक्सर ऐसी त्रासदियों को जन्म देती हैं।
पृष्ठभूमि और केस का विकास
2019 में, एसएस कॉलोनी पुलिस ने एक ज्वेलरी चोरी के आरोप में 17‑वर्षीय मुग़ु कार्थिक को गिरफ्तार किया और तीन दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा। पुलिस ने उसे कई बार मारपीट की, जिसके परिणामस्वरूप उसकी शारीरिक स्थिति में गंभीर चोटें पाई गईं। जब वह राजाजी अस्पताल में उपचार के लिए ले जाया गया, तो वह अपने घावों के कारण ही मृत्यु हो गई।
न्यायिक प्रक्रिया और सजा
2025 में मदुरै स्थित पाँचवीं अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने चार पुलिसकर्मियों—इंस्पेक्टर एस. एलेक्सराज, स्पेशल सब‑इंस्पेक्टर आर. रवीचंद्रन, हेड कॉन्स्टेबल एस. रवीचंद्रन और ग्रेड‑I कॉन्स्टेबल सी. सतीशकुमार—को कुल 11 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई। यह निर्णय उनके द्वारा किए गए अत्याचार और मृत्युदंड की गंभीरता को दर्शाता है।
हाई कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस बी. पुगलेन्धी ने न्यायालय में कहा कि “एक 17‑वर्षीय नाबालिग की मृत्यु प्राकृतिक नहीं थी। मृत्युपरिणाम की जाँच में 25 पूर्व‑मृत्यु चोटें पाई गईं, जो हिरासत में की गई यातना का स्पष्ट प्रमाण हैं।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह मामला केवल व्यक्तिगत अधिकारी की विफलता नहीं, बल्कि कई स्तरों पर संस्थागत असफलता को दर्शाता है।
भविष्य के प्रभाव और सिफारिशें
अदालत ने पुलिस, अस्पताल और बाल न्याय बोर्ड की भूमिका की भी आलोचना की, यह कहते हुए कि सभी संस्थाओं ने इस मामले में निष्पक्षता नहीं बरती। कोर्ट ने संस्थागत प्रमुखों को आदेश दिया कि वे जिम्मेदारियों की जाँच करें, नियमों के अनुसार उत्तरदायित्व तय करें और आवश्यक विभागीय कार्यवाही प्रारंभ करें। यह निर्णय भारत में पुलिस सुधार, बाल अधिकार संरक्षण और न्यायिक पारदर्शिता के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक बन सकता है।
इस प्रकार, कोर्ट का यह ठोस फैसला न केवल दोषियों को सजा दिलाने में सफल रहा, बल्कि भविष्य में समान त्रासदियों को रोकने के लिए संस्थागत उत्तरदायित्व को भी सुदृढ़ किया।