सुप्रीम कोर्ट अब तय करेगा कि वैवाहिक बलात्कार से जुड़े अपवाद को हटाकर पति को शारीरिक या मानसिक चोट के लिए दंडित किया जा सकता है या नहीं। यह मामला घरेलू हिंसा और महिलाओं के अधिकारों पर गहरा असर डाल सकता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • विवाह में बलात्कार अपवाद पर सुप्रीम कोर्ट का पुनरावलोकन
  • भारी शारीरिक या मानसिक चोट के लिए पति को दंडित करने की संभावना
  • कानून में परिवर्तन के संभावित सामाजिक और कानूनी प्रभाव

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने यह घोषणा की है कि वह वैवाहिक बलात्कार से जुड़े मौजूदा अपवादों की संवैधानिक वैधता पर पुनः विचार करेगा और साथ ही यह सवाल उठाएगा कि क्या पति को अपने साथी को हिंसक, असामान्य या किसी भी प्रकार के यौन कृत्य से शारीरिक या मानसिक क्षति पहुँचाने पर दंडित किया जा सकता है। यह मुद्दा कई वर्षों से चल रहे दायित्वों और सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देता है।

पृष्ठभूमि और मौजूदा कानूनी ढांचा

भारतीय दंड संहिता की धारा 375(2) में वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक अपराध से बाहर रखा गया है, जिससे 15 वर्ष से अधिक आयु वाली वैवाहिक पत्नी के साथ सहमति‑रहित यौन संबंध को बलात्कार नहीं माना जाता। 2017 में इस आयु सीमा को 18 वर्ष कर दिया गया, जिसे भारतीय दंड संहिता (BNS) ने अपनाया। 2013 के आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम ने इस अपवाद को और विस्तृत किया, जिससे सभी प्रकार के यौन कृत्य को पति द्वारा किया जाना “स्वाभाविक” माना गया।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का महत्व

न्यायपालिका इस बात पर विचार करेगी कि क्या धारा 375(2) और BNS की धारा 63 को निरस्त करके एक नया अपराध निर्मित किया जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो वह न केवल वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक बनाएगा, बल्कि उन मामलों को भी कवर करेगा जहाँ पति अपने जीवनसाथी को शारीरिक या मानसिक चोट पहुँचाता है, जैसे कि हिंसक या असामान्य यौन कृत्य। यह दिशा-निर्देश भारत में घरेलू हिंसा के मौजूदा ढांचे को पुनः परिभाषित कर सकता है।

केन्द्र का प्रतिरोध और सामाजिक प्रतिपुष्टि

केन्द्र सरकार ने वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक बनाने के विरोध में कहा है कि विवाह एक विशेष संबंध है और इसे केवल यौन संबंध के आधार पर नहीं देखा जा सकता। सरकार का तर्क है कि संसद ने जानबूझकर यह अपवाद बनाया था और इसे हटाना अनुपातहीन होगा। हालांकि, यह बात स्पष्ट है कि पति को अपने पत्नी की सहमति का उल्लंघन करने का कोई अधिकार नहीं है, और न्यायिक परिवर्तन संभावित रूप से इस सिद्धांत को सुदृढ़ कर सकता है।

भविष्य की संभावनाएँ

यदि सुप्रीम कोर्ट अपवाद को हटाने की दिशा में फैसला करता है, तो यह भारत में लैंगिक समानता और महिलाओं के सुरक्षा कानूनों में एक मील का पत्थर बन सकता है। न्यायिक दृष्टिकोण से यह परिवर्तन न केवल कानूनी प्रावधानों को अपडेट करेगा, बल्कि सामाजिक जागरूकता को भी बढ़ाएगा, जिससे पीड़ित महिलाएँ अधिक आश्वस्त हो सकेंगी कि उनके अधिकारों की रक्षात्मक प्रणाली मौजूद है। साथ ही, यह अन्य न्यायालयों को समान मामलों में सुसंगत निर्णय देने में मदद करेगा।