कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के अध्यक्ष विनीत गुप्ता ने तमिलनाडु और कर्नाटक को पानी के संकट के बंटवारे के लिए एक वैज्ञानिक फार्मूला विकसित करने की चुनौती दी है। उन्होंने दोनों राज्यों के बीच बढ़ते विवाद के बीच डेटा और वर्षा के पैटर्न का हवाला दिया है।
मुख्य बातें
- CWRC प्रमुख ने राज्यों को स्वयं संकट-साझाकरण फार्मूला तैयार करने का सुझाव दिया।
- तमिलनाडु ने वर्तमान जल वितरण प्रणाली को 'अवैज्ञानिक' बताते हुए आपत्ति जताई है।
- डेटा के अनुसार, वर्तमान में जलाशयों में भारी कमी और वर्षा का अभाव देखा जा रहा है।
- कर्नाटक को निर्धारित मात्रा से अधिक पानी छोड़ना पड़ रहा है क्योंकि बीच का क्षेत्र सूखा है।
कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के अध्यक्ष विनीत गुप्ता ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण बयान देते हुए तमिलनाडु और कर्नाटक सरकारों को पानी के संकट के समय बंटवारे के लिए एक स्थायी और वैज्ञानिक फार्मूला खुद तैयार करने का आग्रह किया है। यह बयान तमिलनाडु द्वारा CWRC और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) की कार्यप्रणाली पर उठाए गए सवालों के जवाब में आया है।
तमिलनाडु का आरोप है कि ये संस्थाएं एक 'स्थायी और वैज्ञानिक फार्मूले' का पालन नहीं कर रही हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए श्री गुप्ता ने सवाल किया कि यदि राज्यों को वर्तमान व्यवस्था से समस्या है, तो वे स्वयं एक समाधान पेश क्यों नहीं करते? उन्होंने स्पष्ट किया कि 2023-24 के जल वर्ष के दौरान दोनों निकायों ने पहले ही एक संकट-साझाकरण तंत्र पर काम किया था।
क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि कावेरी नदी का मुद्दा केवल पानी के बंटवारे का नहीं, बल्कि दो राज्यों के बीच राजनीतिक और पारिस्थितिक संतुलन का भी है। वर्तमान में, कावेरी बेसिन के बीच का क्षेत्र (KRS-Kabini बांधों और Biligundlu के बीच) पूरी तरह से सूखा पड़ा है। इस सूखे के कारण, कर्नाटक को निर्धारित 3,500 क्यूसेक के बजाय 6,000 से 6,500 क्यूसेक पानी छोड़ना पड़ रहा है ताकि सीमा पर आवश्यक मात्रा पहुँच सके।
"राज्यों को केवल विवाद करने के बजाय डेटा-आधारित वैज्ञानिक समाधान की ओर बढ़ना चाहिए।"
डेटा के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 30 वर्षों के औसत की तुलना में, कर्नाटक के जलाशयों में 60% की कमी और Biligundlu पर 90% की भारी कमी देखी गई है। जुलाई महीने में अब तक कुल प्राप्ति 1 tmc ft के निशान को भी नहीं छू पाई है। वर्तमान आकलन के अनुसार, कुल कमी 9.8 tmc ft है, जिसमें से 50% की भरपाई कर्नाटक द्वारा की जा सकती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का अंतिम निर्णय 2007 में आया था, जिसे 2018 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संशोधित किया गया था। CWRC और CWMA इसी निर्णय के कार्यान्वयन के लिए बनाई गई संस्थाएं हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. तमिलनाडु की मुख्य शिकायत क्या है?
तमिलनाडु का कहना है कि जल वितरण के लिए कोई स्थायी और वैज्ञानिक फार्मूला लागू नहीं किया जा रहा है।
2. कर्नाटक को अधिक पानी क्यों छोड़ना पड़ रहा है?
चूंकि बीच का जलग्रहण क्षेत्र सूखा है, इसलिए निर्धारित मात्रा सुनिश्चित करने के लिए कर्नाटक को अधिक पानी छोड़ना पड़ता है।