एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने कहा कि भारत को युद्ध के मैदान में बढ़त बनाए रखने के लिए प्रयोगशालाओं से सीधे युद्धक्षेत्र तक ड्रोन तकनीक को तेजी से पहुंचाना होगा। उन्होंने पूर्ण आत्मनिर्भरता के लिए हर पुर्जे का भारत में निर्माण करने का आह्वान किया।

मुख्य बातें

  • IAF प्रमुख ने स्वदेशी ड्रोन तकनीक के तेजी से विकास और सैन्य उपयोग पर जोर दिया।
  • 'तकनीकी देरी मतलब तकनीक का इनकार' - ए.पी. सिंह की चेतावनी।
  • पूर्ण आत्मनिर्भरता के लिए ड्रोन के हर घटक का भारत में निर्माण अनिवार्य।
  • मानवरहित और मानवयुक्त विमानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता।

नई दिल्ली में आयोजित 'संकल्प' कार्यशाला के दौरान, भारतीय वायुसेना (IAF) के प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य के संघर्षों में भारत को पीछे न छूटना पड़े, इसके लिए ड्रोन और अन्य महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों का विकास और तैनाती अत्यंत तीव्र होनी चाहिए।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने एक महत्वपूर्ण चेतावनी देते हुए कहा, "तकनीकी देरी का अर्थ है तकनीक का इनकार।" उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई तकनीकी नवाचार अन्य देशों के उन्नत होने के बाद मैदान में आता है, तो उसका रणनीतिक महत्व समाप्त हो जाता है। उन्होंने प्रमाणन एजेंसियों से भी आग्रह किया कि वे परीक्षण और अनुमोदन की प्रक्रियाओं में तेजी लाएं ताकि नई क्षमताओं को सेना में समय पर शामिल किया जा सके।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि आधुनिक युद्ध अब केवल लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं है, बल्कि ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियों का वर्चस्व बढ़ रहा है। यदि भारत केवल महत्वपूर्ण घटकों के लिए आयात पर निर्भर रहता है, तो आपातकालीन स्थितियों के दौरान यह एक बड़ी रणनीतिक कमजोरी साबित हो सकती है।

"हर ईंट भारत में बनाई जानी चाहिए, तभी हम वास्तव में आत्मनिर्भर कह सकते हैं।" - एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह

सिंह ने युद्ध के बदलते स्वरूप पर चर्चा करते हुए कहा कि हालांकि ड्रोन महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे सीमित पेलोड क्षमता के कारण लड़ाकू विमानों का स्थान नहीं ले सकते। इसलिए, उन्हें बड़ी संख्या में तैनात करने और उन्हें मानवयुक्त विमानों के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, वे नागरिक उड्डयन मंत्रालय के साथ मिलकर 'रॉग ड्रोन' और अधिकृत ड्रोन के बीच अंतर करने के लिए एक तंत्र विकसित करने पर भी काम कर रहे हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत लंबे समय से रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के तहत रक्षा उत्पादन में घरेलू भागीदारी में भारी वृद्धि हुई है, जिसमें ड्रोन और मिसाइल प्रणालियों का विकास प्रमुख है।

क्या आप जानते हैं?: आधुनिक युद्धक्षेत्र में 'स्वार्म ड्रोन' (झुंड में उड़ने वाले ड्रोन) का उपयोग दुश्मन के रडार और रक्षा प्रणालियों को भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. वायुसेना प्रमुख ने 'आत्मनिर्भरता' के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि केवल अंतिम उत्पाद ही नहीं, बल्कि ड्रोन के हर छोटे घटक का निर्माण भारत में होना चाहिए।

2. ड्रोन लड़ाकू विमानों की जगह क्यों नहीं ले सकते?
सीमित पेलोड क्षमता और उच्च विफलता दर के कारण, ड्रोन को लड़ाकू विमानों के पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि उनके विकल्प के रूप में।