सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया आदेश ने भारत में 'पोस्ट-फैक्टो' यानी काम पूरा होने के बाद पर्यावरण मंजूरी देने की प्रथा पर बहस छेड़ दी है। क्या निर्माण के बाद पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई संभव है?
मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने 'पोस्ट-फैक्टो' पर्यावरण मंजूरी पर कानूनी बहस को पुनर्जीवित किया है।
- सवाल यह है कि क्या निर्माण या पर्यावरणीय क्षति होने के बाद परियोजनाओं को वैध माना जा सकता है।
- यह मामला पर्यावरण शासन और सतत विकास के भविष्य को प्रभावित करेगा।
भारत में पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास के बीच का संघर्ष एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया निर्णय ने 'पोस्ट-फैक्टो' (कार्य के पश्चात) पर्यावरण मंजूरी के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है। यह बहस इस बात पर आधारित है कि क्या कोई कंपनी कानून का उल्लंघन करने और निर्माण कार्य शुरू करने के बाद पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त कर सकती है।
पारंपरिक रूप से, पर्यावरण मंजूरी परियोजना शुरू होने से पहले ली जानी चाहिए ताकि पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जा सके। हालांकि, कई मामलों में कंपनियां बिना अनुमति के काम शुरू कर देती हैं और बाद में 'नियमों के अनुपालन' के नाम पर मंजूरी की मांग करती हैं। यह प्रवृत्ति नियामक संस्थाओं की शक्ति को कमजोर करती है और 'पहले उल्लंघन करो, फिर अनुमति मांगो' की संस्कृति को बढ़ावा देती है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यदि पोस्ट-फैक्टो मंजूरी को सामान्य माना जाता है, तो यह पर्यावरण संरक्षण कानूनों के मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर देगा। इससे बड़े कॉर्पोरेट घरानों को कानून को दरकिनार करने का एक आसान रास्ता मिल जाएगा, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन होगा।
पर्यावरण कानून का उल्लंघन करने के बाद मंजूरी देना, कानून की भावना को मारने जैसा है।
ऐतिहासिक रूप से, भारत में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और अन्य नियामक ढांचे यह सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए थे कि विकास की कीमत प्रकृति को न चुकानी पड़े। लेकिन, न्यायिक निर्णयों और प्रशासनिक ढिलाई के बीच एक महीन रेखा है जो अक्सर धुंधली हो जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. 'पोस्ट-फैक्टो' मंजूरी क्या है?
इसका अर्थ है किसी परियोजना के निर्माण या संचालन के शुरू होने के बाद उसे पर्यावरण संबंधी कानूनी अनुमति देना।
2. इससे पर्यावरण को क्या खतरा है?
इससे स्थायी नुकसान हो सकता है जिसे बाद में किसी भी कानूनी कागजी कार्रवाई से ठीक नहीं किया जा सकता।