1914 में ब्रिटेन के प्रथम विश्व युद्ध में प्रवेश ने भारत को भी इस संघर्ष में खींच लिया। लाखों भारतीयों के बलिदान और ब्रिटिश सरकार के अधूरे वादों ने कैसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा बदल दी, जानिए इस विस्तृत रिपोर्ट में।

मुख्य बातें

  • 1914 में ब्रिटेन द्वारा युद्ध की घोषणा के साथ भारत भी प्रथम विश्व युद्ध का हिस्सा बना।
  • एक मिलियन से अधिक भारतीयों ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए विदेशों में युद्ध लड़ा।
  • युद्ध के दौरान किए गए स्वशासन के वादे युद्ध के बाद दमनकारी कानूनों (रौलेट एक्ट) में बदल गए।
  • भारतीय सैनिकों के बलिदान को ब्रिटिश स्मारक सेवा में वह सम्मान नहीं मिला जो ब्रिटिश सैनिकों को मिला।

4 अगस्त, 1914 को ग्रेट ब्रिटेन द्वारा जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा के साथ ही भारत भी अनचाहे रूप से प्रथम विश्व युद्ध के विनाशकारी चक्र में फंस गया। उस समय भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी स्वैच्छिक सेनाओं में से एक थी। लाखों भारतीयों ने साम्राज्य की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी, लेकिन युद्ध की समाप्ति के बाद जो मिला, वह स्वायत्तता नहीं बल्कि और अधिक दमन था।

स्वशासन के वादे और ब्रिटिश मंशा

युद्ध के दौरान, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने संवैधानिक सुधारों की मांग तेज कर दी थी। 1916 के लखनऊ सत्र में कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से जल्द से जल्द 'स्वशासन' देने का आग्रह किया। हालांकि, ब्रिटिश नीति निर्माताओं की मंशा स्पष्ट नहीं थी। इतिहासकार वाल्टर रीड के अनुसार, ब्रिटेन का मानना था कि यदि भारत को स्वतंत्रता मिली भी, तो वह आज से कम से कम 100 साल दूर होगी।

बौज़ोकमीडिया विश्लेषण: क्यों महत्वपूर्ण है यह मोड़?

बौज़ोकमीडिया विश्लेषण दर्शाता है कि युद्ध ने भारत के राजनीतिक भविष्य को एक नया मोड़ दिया। एक तरफ ब्रिटेन को तुर्की के खिलाफ युद्ध में भारतीय सेना की भारी जरूरत थी, वहीं दूसरी तरफ वह भारतीय आकांक्षाओं को कुचलने का प्रयास कर रहा था। यह विरोधाभास ही था जिसने भविष्य के बड़े आंदोलनों की नींव रखी।

युद्ध ने राजनीतिक घड़ी को पचास साल आगे बढ़ा दिया था, लेकिन ब्रिटिश कार्रवाई ने उसे पीछे धकेलने की कोशिश की।

युद्ध के बाद पेश किए गए मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने भारतीय विधायी परिषदों को कुछ शक्ति तो दी, लेकिन वायसराय के पास अत्यधिक अधिकार होने के कारण वे सुधार केवल कागजी बनकर रह गए।

बलिदान बनाम उपेक्षा: एक कड़वा सच

युद्ध के शहीदों को सम्मानित करने के मामले में भी अंग्रेजों ने दोहरे मापदंड अपनाए। जहाँ ब्रिटिश सैनिकों के नाम व्यक्तिगत रूप से स्मारकों पर दर्ज किए गए, वहीं 33,000 से अधिक भारतीय सैनिकों को केवल 'संख्याओं' के रूप में दर्ज किया गया। यह उपेक्षा भारतीय जनमानस में गहरा असंतोष पैदा करने वाली थी।

विशेषताब्रिटिश सैनिकभारतीय सैनिक
स्मारक सम्मानव्यक्तिगत नाम दर्जकेवल संख्या के रूप में दर्ज
सैन्य पदोन्नतिउच्चतम रैंक तक पहुंच1930 तक कप्तान से ऊपर नहीं
क्या आप जानते हैं?: 1914 के अंत तक, केवल पंजाब से ही 13,400 नए सैनिकों ने ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर अपना योगदान दिया था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. प्रथम विश्व युद्ध में भारत का क्या योगदान था?
भारत ने एक विशाल स्वैच्छिक सेना प्रदान की और लाखों सैनिकों ने मेसोपोटामिया और पश्चिमी मोर्चों पर युद्ध लड़ा।

2. रौलेट एक्ट का स्वतंत्रता संग्राम पर क्या प्रभाव पड़ा?
रौलेट एक्ट ने बिना मुकदमे के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल भेजने की शक्ति दी, जिससे जनता में आक्रोश बढ़ा और आंदोलन तेज हुआ।

संपादकीय टिप्पणी

ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत के खून से अपना युद्ध तो जीत लिया, लेकिन उसी खून से उपजे आक्रोश ने उनके शासन की नींव हिला दी। वादों का उल्लंघन ही भारतीय क्रांति का सबसे बड़ा ईंधन बना।