एक हालिया आरटीआई (RTI) जवाब से खुलासा हुआ है कि 20 जुलाई को दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान कम से कम दस प्रदर्शनकारी पेलेट या प्रोजेक्टाइल की चोटों से घायल हुए थे। इस खुलासे ने भीड़ नियंत्रण के तरीकों पर बहस छेड़ दी है, जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने सीआरपीएफ (CRPF) से स्पष्टीकरण मांगा है।

मुख्य बातें

  • 20 जुलाई को दिल्ली के दो अस्पतालों में कम से कम 10 प्रदर्शनकारियों का पेलेट/प्रोजेक्टाइल चोटों के लिए इलाज किया गया।
  • यह जानकारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक नेता द्वारा दायर की गई आरटीआई (RTI) के जरिए सामने आई है।
  • दिल्ली पुलिस ने सीआरपीएफ (CRPF) से पेलेट गन के इस्तेमाल की मंजूरी और उपयोग को लेकर विवरण मांगा है।

पेलेट गन का इस्तेमाल, जो आमतौर पर कश्मीर जैसे उच्च-संघर्ष वाले क्षेत्रों से जुड़ा रहा है, अब देश की राजधानी में एक नए विवाद का कारण बन गया है। टीएमसी सांसद द्वारा प्राप्त एक आरटीआई जवाब से पता चलता है कि 20 जुलाई को हुए प्रदर्शनों के बाद दिल्ली के दो प्रमुख सरकारी अस्पतालों में कम से कम दस लोगों का पेलेट या प्रोजेक्टाइल से लगी चोटों के लिए इलाज किया गया था। इस खुलासे ने सुरक्षा बलों द्वारा भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अपनाए जाने वाले तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी में प्रदर्शन के दौरान घायल हुए लोगों के इलाज का विवरण मांगा गया था। अस्पतालों के मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार, इन दस मरीजों के शरीर पर ऐसे घाव पाए गए जो पेलेट फायर या उच्च वेग वाले प्रोजेक्टाइल के सीधे प्रभाव से मेल खाते हैं। यह जानकारी प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग के स्तर को लेकर पुलिस के शुरुआती बयानों को सीधे तौर पर चुनौती देती है।

भारत में पेलेट गन के उपयोग का ऐतिहासिक संदर्भ

पेलेट गन या पंप-एक्शन शॉटगन को भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा 2010 में भीड़ नियंत्रण के लिए एक "गैर-घातक" (non-lethal) विकल्प के रूप में पेश किया गया था, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में। हालांकि, आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चले जाने और शरीर के अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचने के कारण इसके इस्तेमाल की अंतरराष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर कड़ी आलोचना हुई है। दिल्ली जैसे महानगर में छात्रों या नागरिक प्रदर्शनों के खिलाफ ऐसे हथियारों का इस्तेमाल भीड़ नियंत्रण के नियमों में एक गंभीर और असामान्य बदलाव को दर्शाता है।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि राष्ट्रीय राजधानी में पेलेट गन का उपयोग शहरी पुलिसिंग के मानकों में एक बड़ा और संभावित रूप से खतरनाक बदलाव है। यदि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए इस स्तर के "कम-घातक" हथियारों को सामान्य मान लिया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक असहमति के अधिकार को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा और मानवाधिकारों को लेकर बड़े सवाल खड़े करेगा।

"शहरी विरोध प्रदर्शनों में पेलेट शॉटगन का उपयोग बल के आनुपातिकता के अंतरराष्ट्रीय पुलिसिंग मानकों का खुला उल्लंघन है," एक वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता ने कहा।
तरीकावर्गीकरणमुख्य जोखिमदूरी सीमा
पेलेट गनकम-घातक (उच्च जोखिम)अंधापन, गहरे घाव, मृत्यु की संभावनामध्यम से लंबी
आंसू गैसगैर-घातकसांस लेने में तकलीफ, अस्थायी अंधापनमध्यम
वाटर कैननगैर-घातकशारीरिक चोट, हाइपोथर्मियाकम से मध्यम
क्या आप जानते हैं?: एक पेलेट गन कार्ट्रिज में 500 तक छोटे सीसे या धातु के छर्रे हो सकते हैं, जो चलने के बाद हवा में फैल जाते हैं, जिससे किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाना असंभव हो जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: पेलेट गन की चोटों के संबंध में आरटीआई किसने दायर की थी?
उत्तर 1: यह आरटीआई तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक सांसद द्वारा दायर की गई थी ताकि घायल प्रदर्शनकारियों के इलाज की सच्चाई सामने आ सके।

प्रश्न 2: दिल्ली पुलिस इस मामले में क्या कार्रवाई कर रही है?
उत्तर 2: दिल्ली पुलिस ने सीआरपीएफ से आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान पेलेट गन का उपयोग किया गया था।