कर्नाटक उच्च न्यायालय के कड़े आदेश के बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने शिवमोगा के कुडली में रामेश्वर मंदिर के प्रतिबंधित क्षेत्र में निर्माण कार्य रोकने के लिए मठ को नोटिस जारी किया है। यह मामला फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अनुमति लेने के आरोपों से जुड़ा है।

  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कुडली के रामेश्वर मंदिर के प्रतिबंधित क्षेत्र में सभी निर्माण कार्यों पर तत्काल रोक लगा दी है।
  • एएसआई (ASI) ने फरवरी 2025 में कई नोटिस जारी किए थे, लेकिन मठ ने उनका उल्लंघन करते हुए काम जारी रखा।
  • निर्माण की अनुमति कथित तौर पर तहसीलदार के एक फर्जी पत्र के आधार पर राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (NMA) से ली गई थी।

शिवमोगा के कुडली में स्थित 12वीं शताब्दी के ऐतिहासिक होयसला वास्तुकला के नमूने, रामेश्वर मंदिर को बचाने के लिए कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया है। सोमवार, 17 अगस्त 2026 को, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकारियों ने श्री कुडली आर्य अक्षोभ्य तीर्थ मठ को आधिकारिक नोटिस सौंपकर प्रतिबंधित क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्यों को तुरंत रोकने का निर्देश दिया।

यह विवाद तब गहराया जब स्थानीय निवासियों और पर्यावरण प्रेमियों ने इस ऐतिहासिक स्थल, जो तुंगा और भद्रा नदियों के संगम पर स्थित है, के आसपास हो रहे अनधिकृत निर्माण का विरोध किया। मधुसूदन सी.जी. नामक एक निवासी ने जनहित याचिका (PIL) दायर कर एएसआई के आदेशों के उल्लंघन का मुद्दा उठाया था।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह घटना भारत में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। जब धार्मिक संस्थान सरकारी नियमों की अनदेखी करते हैं, तो सदियों पुराने स्मारकों की संरचनात्मक अखंडता को स्थायी खतरा होता है। यह मामला यह भी उजागर करता है कि कैसे फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से नियामक निकायों को गुमराह किया जा सकता है।

"ऐतिहासिक स्मारकों के प्रतिबंधित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार का निर्माण न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत के साथ एक अपरिवर्तनीय अपराध है।"

अदालती कार्यवाही के दौरान मुख्य न्यायाधीश विभु बखरू और न्यायमूर्ति के.एस. हेमलेखा की पीठ ने पाया कि एएसआई ने 7 फरवरी और 18 फरवरी 2025 को स्पष्ट नोटिस जारी किए थे, लेकिन मठ ने उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज किया। अदालत ने अब स्पष्ट कर दिया है कि अगली सुनवाई (25 नवंबर 2026) तक कोई भी नया निर्माण नहीं किया जाएगा।

जांच में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि मठ ने मार्च 2023 में राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (NMA) से अनुमति प्राप्त की थी। यह अनुमति इस दावे पर दी गई थी कि बाढ़ के कारण पुरानी संरचना ढह गई थी, जिसके समर्थन में तहसीलदार का एक पत्र पेश किया गया था। हालांकि, बाद में यह पाया गया कि तहसीलदार ने ऐसा कोई पत्र जारी ही नहीं किया था।

विवरणदावा (मठ द्वारा)वास्तविकता (जांच के अनुसार)
निर्माण अनुमतिNMA से स्वीकृतफर्जी पत्र के आधार पर प्राप्त
तहसीलदार का पत्रबाढ़ से नुकसान की पुष्टिऐसा कोई पत्र जारी नहीं हुआ
ASI नोटिसअनुपालन का दावानोटिस के बावजूद काम जारी रहा
क्या आप जानते हैं?: होयसला साम्राज्य अपनी जटिल नक्काशी और तारा-आकार के मंदिर प्लेटफार्मों के लिए जाना जाता है, जिन्हें यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी स्थान मिला है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. प्रतिबंधित क्षेत्र (Prohibited Area) क्या होता है?
एएसआई के नियमों के अनुसार, संरक्षित स्मारक के चारों ओर एक निश्चित दूरी का क्षेत्र 'प्रतिबंधित' होता है जहाँ बिना अनुमति के किसी भी निर्माण की मनाही होती है।

2. इस मामले में अगली सुनवाई कब है?
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 के लिए निर्धारित की है।