दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजीव गांधी फाउंडेशन को 'सार्वजनिक प्राधिकरण' घोषित करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है, जिससे यह संस्था आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर बनी रहेगी।
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजीव गांधी फाउंडेशन को आरटीआई के दायरे में लाने वाली याचिका खारिज की।
- अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता कई तारीखों पर उपस्थित नहीं हुआ।
- फाउंडेशन का तर्क था कि सरकारी फंडिंग कुल बजट का केवल 4% है, जो इसे सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं बनाता।
नई दिल्ली में स्थित दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें राजीव गांधी फाउंडेशन को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत एक 'सार्वजनिक प्राधिकरण' (Public Authority) घोषित करने की मांग की गई थी। जस्टिस स्वर्ण कांत ने 2011 से लंबित इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता कई सुनवाई तारीखों पर अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।
यह कानूनी लड़ाई तब शुरू हुई जब दिल्ली के वकील शनमुगा पात्रो ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 15 अक्टूबर 2010 के आदेश को चुनौती दी थी। CIC ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि राजीव गांधी फाउंडेशन एक सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है, इसलिए यह आरटीआई के तहत जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है।
विवाद की जड़ और कानूनी तर्क
याचिकाकर्ता शनमुगा पात्रो का तर्क था कि फाउंडेशन को सरकार से फंड मिलता है और यह बड़े पैमाने पर सार्वजनिक गतिविधियों में शामिल है, इसलिए इसे पारदर्शिता के दायरे में आना चाहिए। उन्होंने फाउंडेशन के संविधान, उप-नियमों और संगठनात्मक ढांचे के दस्तावेजों की मांग की थी, जिसे फाउंडेशन ने 2009 में यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वह आरटीआई के दायरे में नहीं आता है।
"किसी भी संस्था को 'सार्वजनिक प्राधिकरण' मानने के लिए केवल मामूली सरकारी अनुदान पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके गठन और नियंत्रण की प्रकृति महत्वपूर्ण होती है।"
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच की धुंधली रेखा को दर्शाता है। यदि किसी संस्था को सार्वजनिक प्राधिकरण माना जाता है, तो उसे अपने हर निर्णय और खर्च का विवरण जनता को देना पड़ता है। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि कम प्रतिशत वाली सरकारी फंडिंग किसी निजी ट्रस्ट को अनिवार्य रूप से आरटीआई के अधीन नहीं बनाती।
अदालत ने पूर्व में फाउंडेशन से उसके गठन से लेकर 2010-11 तक के वार्षिक ऑडिट खातों को रिकॉर्ड पर रखने को कहा था ताकि यह तय किया जा सके कि वह आरटीआई के दायरे में आता है या नहीं। हालांकि, फाउंडेशन के वकील ने दलील दी कि संस्था की स्थापना किसी सरकारी अधिसूचना के माध्यम से नहीं हुई थी और सरकारी फंडिंग कुल बजट का केवल 4% थी, जिसे 'नगण्य' बताया गया।
Frequently Asked Questions
1. क्या अब राजीव गांधी फाउंडेशन से आरटीआई के जरिए जानकारी मांगी जा सकती है?
नहीं, दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि फाउंडेशन आरटीआई अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है।
2. याचिका खारिज होने का मुख्य कारण क्या था?
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता कई तारीखों पर उपस्थित नहीं हुआ, साथ ही फाउंडेशन के सरकारी नियंत्रण और फंडिंग का स्तर बहुत कम था।