मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने पुलिस हिरासत में कथित तौर पर हुई एक व्यक्ति की मृत्यु के मामले में मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए हैं। न्यायालय ने सीसीटीवी फुटेज की जांच और विशेषज्ञों द्वारा पोस्टमार्टम के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने 55 वर्षीय पारमसिवाम की मृत्यु की मजिस्ट्रेट जांच का आदेश दिया।
- पुलिस द्वारा मारपीट और प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगे हैं।
- तीन वरिष्ठ फोरेंसिक प्रोफेसरों द्वारा पोस्टमार्टम करने का निर्देश।
- सीसीटीवी फुटेज की सत्यता जांचने के लिए एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति।
मदुरै: मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए 55 वर्षीय पारमसिवाम की संदिग्ध मृत्यु के मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए हैं। मृतक के परिवार ने आरोप लगाया है कि उनकी मृत्यु पुलिस की बर्बरता और अत्यधिक बल प्रयोग के कारण हुई है।
न्यायमूर्ति पी. मुरुगन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निर्देश दिया कि शव का पोस्टमार्टम केवल मदुरै, थेनी और शिवगंगा सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों के फोरेंसिक विभाग के तीन वरिष्ठ प्रोफेसरों की एक संयुक्त टीम द्वारा किया जाए। यह कदम जांच में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
अदालत ने एडवोकेट आयराम के. सेलवाकुमार को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया है। उनका मुख्य कार्य यह पता लगाना होगा कि संबंधित पुलिस स्टेशन में सीसीटीवी कैमरे स्थापित थे या नहीं, और क्या जांच से बचने के लिए किसी कैमरे को हटाया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मेला अनुप्पनडी निवासी पारमसिवाम की पत्नी अय्यम्मल द्वारा दायर एक याचिका पर आधारित है। याचिका के अनुसार, 19 जुलाई को चिन्तामणि पुलिस स्टेशन के कर्मियों ने पूछताछ के नाम पर उनके पति के साथ मारपीट की थी। विवाद की जड़ एक वाहन की पार्किंग को लेकर पड़ोसियों के साथ हुआ मामूली झगड़ा था।
आरोप है कि पुलिस पिटाई के कारण पारमसिवाम के सिर में गंभीर चोटें आईं, जिसके बाद उन्हें सरकारी राजाजी अस्पताल (GRH) में भर्ती कराया गया। हालत बिगड़ने पर 5 अगस्त को उन्हें एक निजी अस्पताल में स्थानांतरित किया गया, लेकिन अंततः 16 अगस्त को उन्होंने दम तोड़ दिया।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला पुलिस जवाबदेही और हिरासत में हिंसा (Custodial Violence) के गंभीर मुद्दे को उजागर करता है। जब एक मामूली पार्किंग विवाद पुलिस हिरासत में मौत में बदल जाता है, तो यह कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करता है। उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता का दुरुपयोग करने वाले अधिकारी बच न सकें।
"हिरासत में मृत्यु लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है; स्वतंत्र न्यायिक जांच ही पीड़ित परिवार को न्याय दिला सकती है।"
इससे पहले, रविवार को आरडीओ (RDO) जांच के आदेश दिए गए थे और कीरैथुरई पुलिस ने संदिग्ध मृत्यु का मामला दर्ज किया था। हालांकि, परिवार ने उच्च न्यायालय से अधिक पारदर्शी जांच की मांग की थी।
Frequently Asked Questions
1. उच्च न्यायालय ने पोस्टमार्टम के लिए विशेष टीम क्यों बनाई?
ताकि जांच पूरी तरह निष्पक्ष हो और किसी भी स्थानीय प्रभाव के बिना मेडिकल रिपोर्ट तैयार की जा सके।
2. एडवोकेट कमिश्नर की क्या भूमिका होगी?
उनका काम पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी कैमरों की भौतिक जांच करना और यह सुनिश्चित करना है कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ न की गई हो।