उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जस्टिस रवि कुमार दिवाकर ने मात्र चार महीनों में 10 अलग-अलग मामलों में 22 लोगों को मौत की सजा सुनाई है, जिससे 'रेरेस्ट ऑफ रेयर' सिद्धांत पर नई बहस छिड़ गई है।

  • जस्टिस रवि कुमार दिवाकर ने अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच 22 लोगों को मृत्युदंड सुनाया।
  • ये सजाएं 10 गंभीर मामलों में दी गईं, जिनमें वकील और होमगार्ड की हत्या शामिल है।
  • जज दिवाकर पहले ज्ञानवापी मस्जिद के वीडियोग्राफी सर्वे के आदेश के लिए चर्चा में रहे थे।
  • सभी मृत्युदंडों की पुष्टि अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा की जानी अनिवार्य है।

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर 3 में तैनात जस्टिस रवि कुमार दिवाकर ने जिस गति से मृत्युदंड सुनाया है, उसने कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है। नवंबर 2025 से इस कोर्ट में तैनात जस्टिस दिवाकर ने अप्रैल से अगस्त के बीच 22 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है।

इस आंकड़े की गंभीरता को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि नालसर विश्वविद्यालय, हैदराबाद के स्क्वायर सर्कल क्लिनिक की 'डेथ पेनल्टी इन इंडिया: एनुअल स्टैटिस्टिक्स रिपोर्ट 2025' के अनुसार, पूरे साल 2025 में उत्तर प्रदेश की सभी ट्रायल कोर्ट्स ने मिलाकर केवल 20 मामलों में 28 मृत्युदंड सुनाए थे। जस्टिस दिवाकर ने अकेले चार महीने में लगभग पूरे राज्य के वार्षिक आंकड़े के बराबर सजाएं सुना दी हैं।

अपराधों की प्रकृति

इन 10 मामलों में जघन्य अपराध शामिल हैं जिन्हें अदालत ने 'रेरेस्ट ऑफ रेयर' (दुर्लभ से दुर्लभतम) श्रेणी में रखा है। इनमें अधिवक्ता समीर सैफी की ₹40 लाख के विवाद में अपहरण और हत्या, ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड रतिराम की हत्या और किसान राजेंद्र सैनी की हत्या जैसे मामले शामिल हैं। इसके अलावा, 2011 के एक हाईवे लूट और हत्या के मामले में 17 जुलाई को चार लोगों को मौत की सजा सुनाई गई।

मामला सजा की तारीख मृत्युदंड की संख्या
अधिवक्ता समीर सैफी हत्याकांड 6 अप्रैल 3
किसान राजेंद्र सैनी हत्याकांड 20 जून 2
होमगार्ड रतिराम हत्याकांड 2 जुलाई 1
हाईवे लूट और हत्या (2011) 17 जुलाई 4

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, इतनी कम अवधि में इतनी अधिक मृत्युदंड की सजाएं न्यायिक निरंतरता और 'रेरेस्ट ऑफ रेयर' सिद्धांत के अनुप्रयोग पर सवाल उठाती हैं। हालांकि फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य त्वरित न्याय देना है, लेकिन एक ही कोर्ट से इतनी अधिक फांसी की सजाएं यह संकेत देती हैं कि सजा के प्रति एक अत्यंत कठोर दृष्टिकोण अपनाया गया है, जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती मिल सकती है।

ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई मृत्युदंड और उच्च न्यायालय द्वारा उसकी पुष्टि के बीच का अंतर अक्सर त्वरित प्रतिशोध और कानूनी विवेक के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।

कौन हैं जस्टिस रवि कुमार दिवाकर?

जुलाई 1980 में जन्मे रवि कुमार दिवाकर 2009 में सिविल जज नियुक्त हुए थे। उन्होंने सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी और बरेली सहित यूपी के कई जिलों में अपनी सेवाएं दी हैं। वह 2022 में तब राष्ट्रीय सुर्खियों में आए जब वाराणसी में सिविल जज रहते हुए उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद उन्हें अंतरराष्ट्रीय नंबरों से धमकी भरे फोन आने की खबरें भी आई थीं।

मार्च 2024 में, 2010 के बरेली दंगों से संबंधित एक आदेश में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तुलना प्लेटो के "फिलॉसफर किंग" से की थी, जिसे बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हटा दिया था।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय कानून के अनुसार, सत्र न्यायालय (Sessions Court) द्वारा दी गई मौत की सजा तब तक लागू नहीं की जा सकती जब तक कि उच्च न्यायालय उसकी पुष्टि न कर दे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या इन 22 दोषियों को तुरंत फांसी दे दी जाएगी?
नहीं। भारतीय कानून के तहत, ट्रायल कोर्ट की सजा की पुष्टि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा करना अनिवार्य है।

प्रश्न 2: 'रेरेस्ट ऑफ रेयर' सिद्धांत क्या है?
यह एक न्यायिक दिशा-निर्देश है जिसके तहत मृत्युदंड केवल उन अपराधों के लिए सुरक्षित रखा जाता है जो समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर देने वाले और अत्यंत क्रूर हों।