मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अफीम किसानों ने नई दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करते हुए केंद्र सरकार से 2026-27 की लाइसेंस नीति में अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप बदलाव की मांग की है।

  • किसानों ने सरकारी खरीद मूल्य को बढ़ाकर ₹1,00,000 प्रति किलोग्राम करने की मांग की है।
  • 1990 से रद्द किए गए अफीम पट्टों (leases) को बहाल करने की अपील।
  • पोस्त के भूसे (poppy straws) को NDPS अधिनियम से बाहर करने और CPS विधि को समाप्त करने की मांग।

कृषि क्षेत्र की मांगों में एक बड़ा मोड़ आया है, जब मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अफीम किसानों ने सोमवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जोरदार प्रदर्शन किया। भारतीय अफीम किसान संघर्ष समिति के बैनर तले जुटे इन किसानों ने केंद्र सरकार को एक ज्ञापन सौंपा है। यह प्रदर्शन सितंबर में घोषित होने वाली 2026-27 की अफीम लाइसेंस नीति से ठीक पहले हुआ है।

किसानों की मुख्य शिकायत घरेलू खरीद मूल्य और अंतरराष्ट्रीय बाजार मूल्य के बीच के भारी अंतर को लेकर है। किसानों की मांग है कि सरकारी खरीद दर को बढ़ाकर ₹1,00,000 प्रति किलोग्राम किया जाए। उनका तर्क है कि वर्तमान मूल्य संरचना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फसल के वास्तविक आर्थिक मूल्य को प्रतिबिंबित नहीं करती है, जिससे किसान आर्थिक रूप से पिछड़ रहे हैं।

कीमतों के अलावा, किसानों ने लाइसेंसिंग व्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों की मांग की है। उन्होंने आग्रह किया है कि 1990 से रद्द किए गए अफीम पट्टों को बहाल किया जाए ताकि खेती का विस्तार हो सके। साथ ही, उन्होंने मांग की कि अफीम पट्टे तीन किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के मॉर्फिन उत्पादन के आधार पर दिए जाएं, क्योंकि मॉर्फिन की मात्रा प्राकृतिक कारकों पर निर्भर करती है जो किसान के नियंत्रण में नहीं है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह आंदोलन सख्त नार्कोटिक नियमों और विशिष्ट किसानों के आर्थिक अस्तित्व के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है। नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम से पोस्त के भूसे को बाहर निकालने की मांग करके, किसान कृषि अपशिष्ट को आपराधिक नार्कोटिक कानून से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उनका कानूनी जोखिम कम होगा।

दवाइयों की मांग और कृषि अधिकारों का संगम भारत सरकार के लिए एक जटिल नियामक चुनौती पेश करता है, जहां सुरक्षा चिंताएं अक्सर किसानों की आजीविका से टकराती हैं।

किसानों ने अफीम की कटाई की कंसेंट्रेट ऑफ पॉपी स्ट्रॉ (CPS) विधि का भी कड़ा विरोध किया है, जिसे सरकार 2021-22 फसल वर्ष से अंतरराष्ट्रीय अनुभवों के आधार पर बढ़ावा दे रही है। समिति ने CPS पद्धति को पूरी तरह समाप्त कर पारंपरिक खेती को बढ़ावा देने की मांग की है और सुझाव दिया है कि सरकार पोस्त के भूसे को ₹2,000 प्रति किलोग्राम की दर से खरीदे।

2025-26 की नीति के अनुसार, लगभग 1.21 लाख किसान लाइसेंस के लिए पात्र थे, जो पिछले वर्ष की तुलना में 23.5% की वृद्धि है। हालांकि सरकार का कहना है कि वह चिकित्सा और उपशामक देखभाल (palliative care) के लिए एल्कलॉइड की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित कर रही है, लेकिन किसानों का मानना है कि यह वृद्धि पर्याप्त नहीं है।

क्या आप जानते हैं?: अफीम का उत्पादन वैश्विक स्तर पर 'सिंगल कन्वेंशन ऑन नार्कोटिक ड्रग्स (1961)' द्वारा विनियमित है, और भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जिसे औषधीय उद्देश्यों के लिए इसका उत्पादन करने की अनुमति है।
विशेषता वर्तमान/सरकारी स्थिति किसान मांग
खरीद मूल्य मानक सरकारी दर ₹1,00,000 प्रति किलो
कटाई विधि CPS (कंसेंट्रेट ऑफ पॉपी स्ट्रॉ) पारंपरिक विधि
पोस्त भूसा स्थिति NDPS अधिनियम के तहत NDPS अधिनियम से बाहर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: किसान पोस्त के भूसे को NDPS अधिनियम से बाहर क्यों करना चाहते हैं?
किसानों का तर्क है कि पोस्त का भूसा केवल पौधे का बाहरी हिस्सा है, न कि कोई नशीला पदार्थ, इसलिए इसे NDPS अधिनियम के सख्त आपराधिक दंडों के दायरे में नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 2: अफीम कटाई की CPS विधि क्या है?
कंसेंट्रेट ऑफ पॉपी स्ट्रॉ (CPS) एक आधुनिक कटाई तकनीक है जिसे सरकार अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बढ़ावा दे रही है, लेकिन पारंपरिक भारतीय किसान इसे अपने लिए कम लाभदायक मानते हैं।