सुप्रीम कोर्ट ने POCSO अधिनियम के तहत बाल यौन शोषण सामग्री की रिपोर्टिंग में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की गंभीर खामियों पर चिंता जताई है और केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है।
- सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा POCSO एक्ट के तहत रिपोर्टिंग में लापरवाही पर केंद्र से जवाब मांगा।
- आरोप है कि प्लेटफॉर्म भारतीय पुलिस के बजाय अमेरिकी संस्था NCMEC को रिपोर्ट कर रहे हैं।
- याचिका में एक समान रिपोर्टिंग तंत्र (SOP) और डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण की मांग की गई है।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) की रिपोर्टिंग में बरती जा रही लापरवाही पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और कानून एवं न्याय मंत्रालय से जवाब मांगा है।
अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि वे अगली सुनवाई, जो 24 सितंबर को निर्धारित है, से दो सप्ताह पहले अपने जवाबी हलफनामों को दाखिल करें। यह मामला तब सामने आया जब यह आरोप लगाया गया कि सोशल मीडिया मध्यस्थ POCSO अधिनियम के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे हैं।
मुख्य विवाद और आरोप
अदालत के समक्ष दायर याचिका में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया कंपनियां बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री के मामलों की रिपोर्ट सीधे विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU) या स्थानीय पुलिस को नहीं कर रही हैं। इसके बजाय, ये प्लेटफॉर्म कथित तौर पर अमेरिका स्थित नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन (NCMEC) को रिपोर्ट भेजते हैं, जिससे भारतीय जांच एजेंसियों के लिए त्वरित कार्रवाई करना कठिन हो जाता है।
इसके अतिरिक्त, याचिका में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई है कि कुछ प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी आपत्तिजनक सामग्री को बढ़ावा देने वाले सशुल्क विज्ञापन (Paid Ads) भी चल रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि वैधानिक रिपोर्टिंग दायित्वों को पूरा न करने वाले प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला 'सेफ हार्बर' (Safe Harbour) सुरक्षा के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। यदि सोशल मीडिया कंपनियां भारतीय कानूनों का पालन नहीं करती हैं, तो वे मध्यस्थ के रूप में मिलने वाली कानूनी सुरक्षा खो सकती हैं, जिससे उन्हें प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
"डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा के लिए वैश्विक मानकों के बजाय स्थानीय कानूनों का पालन अनिवार्य है, ताकि अपराधियों तक त्वरित पहुंच सुनिश्चित हो सके।"
प्रस्तावित सुधार और मांगें
याचिकाकर्ताओं ने मध्यस्थों के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) की मांग की है। इसमें निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
- CSEAM का पता लगाने और उसकी रिपोर्टिंग के लिए एक समान मानक।
- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का उचित संरक्षण।
- जांच एजेंसियों के साथ IP पते और अन्य डिजिटल जानकारी साझा करना।
- एक केंद्रीकृत ऑनलाइन तंत्र का निर्माण ताकि रिपोर्टिंग त्वरित और पारदर्शी हो।
साथ ही, यह भी मांग की गई है कि ऐसे अपराधों में शामिल व्यक्तियों को कानून के अनुसार राष्ट्रीय यौन अपराधी डेटाबेस में तुरंत शामिल किया जाए।
Frequently Asked Questions
1. POCSO एक्ट के तहत सोशल मीडिया कंपनियों की क्या जिम्मेदारी है?
कंपनियों को किसी भी बाल यौन शोषण सामग्री का पता चलते ही उसकी रिपोर्ट तुरंत स्थानीय पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को देनी होती है।
2. NCMEC क्या है और यह विवाद का कारण क्यों है?
NCMEC एक अमेरिकी संस्था है। विवाद इसलिए है क्योंकि भारतीय कंपनियां भारतीय पुलिस के बजाय विदेशी एजेंसी को रिपोर्ट कर रही हैं, जिससे क्षेत्राधिकार और समय की समस्या पैदा होती है।