सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या 'शांति अधिनियम' (SHANTI Act) परमाणु दुर्घटना के मामले में पीड़ितों को उचित और न्यायसंगत मुआवजा देने से अदालतों को रोकता है।

  • SC ने सवाल किया कि क्या ₹3,000 करोड़ की देयता सीमा उचित मुआवजे के रास्ते में बाधा है।
  • याचिकाकर्ताओं का दावा है कि शांति अधिनियम 2025 संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन करता है।
  • परमाणु ऊर्जा नियामक निकाय (AERB) के सदस्यों की नियुक्ति में 'हितों के टकराव' का मुद्दा उठा।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सस्टेनेबल हारनेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) अधिनियम, 2025 के संबंध में एक महत्वपूर्ण कानूनी हस्तक्षेप किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या इस अधिनियम के तहत निर्धारित वित्तीय सीमाएं अदालतों को परमाणु आपदा के पीड़ितों को उचित मुआवजा देने से रोकती हैं।

यह मामला पूर्व नौकरशाह ई.ए.एस. शर्मा के नेतृत्व में प्रोफेसरों और वैज्ञानिकों के एक समूह द्वारा दायर किया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि शांति अधिनियम, जिसने 2010 के नागरिक देयता अधिनियम का स्थान लिया है, निजी कंपनियों को ₹3,000 करोड़ से अधिक की देयता से छूट देकर एक खतरनाक मिसाल कायम करता है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और नेहा राठी ने तर्क दिया कि ऐसी सीमाएं ऑपरेटरों को सुरक्षा मानकों में लापरवाही बरतने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह कानूनी चुनौती भारत की ऊर्जा सुरक्षा और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। जहां सरकार जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए निजी निवेश आकर्षित करना चाहती है, वहीं शांति अधिनियम की देयता सीमा किसी बड़ी आपदा की स्थिति में राज्य या पीड़ितों पर भारी बोझ डाल सकती है। यह आर्थिक प्रोत्साहन और मौलिक संवैधानिक अधिकारों के बीच का टकराव है।

"परमाणु ऊर्जा जैसे उच्च-जोखिम वाले उद्योगों में देयता को सीमित करना अनजाने में यह संकेत दे सकता है कि वित्तीय लाभ सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण हैं।"

मुआवजे के अलावा, अदालत परमाणु ऊर्जा नियामक निकाय (AERB) के शासन की भी जांच कर रही है। अधिनियम की धारा 17(4) के तहत, सदस्यों की सिफारिश परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) द्वारा गठित पैनल द्वारा की जाती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह हितों का स्पष्ट टकराव है, क्योंकि AEC उन संयंत्रों को चलाने के लिए जिम्मेदार है जिनकी निगरानी AERB को करनी है।

ऐतिहासिक रूप से, परमाणु देयता एक वैश्विक विवाद का विषय रही है। जापान में फुकुशिमा आपदा के बाद कई देशों ने अपने ढांचे का पुनर्मूल्यांकन किया। भारत का 2010 का अधिनियम पहले से ही एक समझौता था, लेकिन 2025 का शांति अधिनियम जोखिम को और अधिक स्थानांतरित करता है, जिससे अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) के उल्लंघन की चिंताएं बढ़ गई हैं।

विशेषता नागरिक देयता अधिनियम 2010 शांति अधिनियम 2025
निजी भागीदारी सीमित/विनियमित प्रोत्साहित/अनुमत
देयता सीमा (Liability Cap) परिवर्तनीय/अधिक ₹3,000 करोड़ तक सीमित
नियामक निरीक्षण AERB मानक AEC-अनुशंसित पैनल
क्या आप जानते हैं?: 'परमाणु देयता' का अर्थ उस कानूनी दायित्व से है जिसके तहत संयंत्र ऑपरेटर को परमाणु घटना से होने वाले नुकसान की भरपाई करनी होती है, चाहे लापरवाही साबित हुई हो या नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. शांति अधिनियम 2025 क्या है?
यह एक कानून है जिसका उद्देश्य परमाणु संयंत्रों में निजी निवेश को बढ़ावा देना है, जिसमें दुर्घटना की स्थिति में ऑपरेटर की वित्तीय जिम्मेदारी को सीमित किया गया है।

2. AERB की नियुक्ति विवादास्पद क्यों है?
क्योंकि संयंत्र चलाने वाली संस्था (AEC) ही उन लोगों की सिफारिश कर रही है जिन्हें उन संयंत्रों का नियमन (Regulate) करना है, जो निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।