महाराष्ट्र सचिवालय के भीतर एक FDA क्लर्क द्वारा रिश्वत लेने के मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने अपनी जांच पूरी कर ली है, लेकिन राज्य सरकार ने अभी तक अभियोजन मंजूरी नहीं दी है।
- ACB ने FDA क्लर्क द्वारा ₹35,000 रिश्वत लेने के मामले में जांच पूरी कर ली है।
- राज्य सरकार ने एक महीने से अधिक समय से अभियोजन मंजूरी के अनुरोध पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
- इस मामले ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया, जिसमें मंत्री नरहरि ज़िरवल के इस्तीफे की मांग की गई।
महाराष्ट्र के सत्ता केंद्र मंत्रालय के भीतर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा की गई एक दुर्लभ छापेमारी ने राज्य प्रशासन में भ्रष्टाचार के गहरे जाल को उजागर किया है। एक खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) क्लर्क की गिरफ्तारी के बाद अब यह मामला कानूनी पेच में फंस गया है, क्योंकि राज्य सरकार ने अभियोजन मंजूरी (Prosecution Sanction) देने में देरी की है।
यह घटना 13 फरवरी की है, जब राजेंद्र ढेरांगे नामक क्लास III FDA क्लर्क को ₹35,000 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था। आरोप है कि ढेरांगे ने मुंबई के एक मेडिकल स्टोर मालिक से उसका निलंबित लाइसेंस बहाल करने के बदले ₹50,000 की मांग की थी, जिसे बाद में बातचीत कर ₹35,000 तय किया गया। यह छापेमारी मंत्रालय की दूसरी मंजिल पर हुई, जहाँ मंत्री नरहरि ज़िरवल का कार्यालय स्थित है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला एक गंभीर प्रणालीगत विफलता को दर्शाता है जहाँ शासन का केंद्र ही भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया। अभियोजन मंजूरी में देरी केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक राजनीतिक जोखिम है। जब सरकार अपने ही कर्मचारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई में देरी करती है, तो यह जनता के बीच यह संदेश जाता है कि प्रशासन दोषियों को बचाने का प्रयास कर रहा है।
इस घटना के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया। महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकल ने मंत्री नरहरि ज़िरवल के इस्तीफे की मांग की और आरोप लगाया कि सचिवालय के भीतर भ्रष्टाचार चरम पर है। हालांकि, ज़िरवल ने किसी भी संलिप्तता से इनकार किया और कहा कि क्लर्क स्वतंत्र रूप से काम कर रहा था। विवाद के बाद, उन्होंने अपने निजी सचिव डॉ. रामदास गाडे को पद से हटाकर उनके मूल विभाग में वापस भेज दिया।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 अक्सर प्रशासनिक देरी का एक उपकरण बन जाती है, जो राजनीतिक दिशा बदलने तक न्याय को प्रभावी रूप से रोक देती है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 के तहत, सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी के बिना अदालत किसी लोक सेवक के खिलाफ रिश्वतखोरी के मामलों का संज्ञान नहीं ले सकती। ACB के महानिदेशक संजीव सिंघल ने पुष्टि की कि मंजूरी का प्रस्ताव एक महीने पहले भेजा गया था। यदि 90 दिनों के भीतर कोई जवाब नहीं मिलता है, तो एजेंसी सबूतों की समीक्षा करेगी और रिमाइंडर जारी करेगी।
छापेमारी के दौरान, ढेरांगे के पास से रिश्वत की राशि के अलावा ₹42,000 अतिरिक्त नकद भी बरामद हुए। चूंकि मंत्रालय के नियमों के अनुसार अंदर केवल ₹10,000 ले जाने की अनुमति है, इसलिए ACB अब इस अतिरिक्त नकदी के स्रोत और आरोपी के बैंक विवरणों की जांच कर रही है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: इस मामले में अभियोजन मंजूरी क्यों आवश्यक है?
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत, लोक सेवकों के खिलाफ मनमाने मुकदमों को रोकने के लिए अदालत में मामला ले जाने से पहले सरकार की आधिकारिक अनुमति अनिवार्य है।
प्रश्न 2: क्या मंत्री नरहरि ज़िरवल दोषी पाए गए?
नहीं, ACB ने स्पष्ट किया है कि मंत्री या उनके पीए के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले हैं; मुख्य आरोपी केवल क्लास III क्लर्क राजेंद्र ढेरांगे है।