मुंबई मोनोरेल की वापसी में एक बार फिर देरी हो गई है क्योंकि MMRDA अभी तक फंसे हुए यात्रियों को सुरक्षित निकालने की ठोस योजना नहीं बना पाया है। सुरक्षा प्रमाणपत्र मिलने के बावजूद, पुरानी गलतियों को न दोहराने के लिए प्रशासन सतर्क है।

  • MMRDA ने यात्रियों की निकासी (evacuation) योजना तैयार न होने के कारण मोनोरेल की शुरुआत में देरी की है।
  • यह फैसला चेंबूर में हुई उस घटना के बाद आया है जहाँ 600 यात्री ट्रेन में फंस गए थे और उन्हें फायर ब्रिगेड ने बचाया था।
  • IIT बॉम्बे और MEIL निकासी विकल्पों पर अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन संरचनात्मक चुनौतियों के कारण समाधान मिलना मुश्किल हो रहा है।

मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MMRDA) ने शहर की मोनोरेल सेवा को फिर से शुरू करने की तारीख को आगे बढ़ा दिया है। हालांकि प्रोजेक्ट ने आवश्यक सुरक्षा प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिए हैं और नए रैक्स (ट्रेन सेट) भी शामिल किए गए हैं, लेकिन एक गंभीर समस्या अब भी बनी हुई है: यदि ट्रेन बीच रास्ते में फंस जाती है, तो यात्रियों को सुरक्षित बाहर कैसे निकाला जाए।

यह प्रशासनिक सावधानी चेंबूर की उस दर्दनाक घटना से प्रेरित है, जब बिजली गुल होने के कारण एक ओवरक्राउडेड ट्रेन में करीब 600 यात्री फंस गए थे। मुंबई फायर ब्रिगेड को यात्रियों को बचाने के लिए ट्रेन के कांच के दरवाजे तोड़ने पड़े थे और इस बचाव कार्य में दो घंटे का समय लगा था।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह देरी केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक विश्वास और कानूनी जवाबदेही का मामला है। मुंबई जैसे घने शहर में, मास ट्रांजिट सिस्टम में किसी भी तरह की विफलता बड़े पैमाने पर भगदड़ या दुर्घटना का कारण बन सकती है। MMRDA की यह हिचकिचाहट दर्शाती है कि स्लम और नालों के ऊपर बने एलिवेटेड कॉरिडोर के लिए आपातकालीन प्रोटोकॉल बनाना कितना चुनौतीपूर्ण है।

इस समस्या के समाधान के लिए ऑपरेटिंग एजेंसी ने IIT बॉम्बे और मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (MEIL) से मदद मांगी है। एक प्रस्ताव के तहत गाइडवे के किनारे वॉकवे (पैदल रास्ता) बनाने की बात कही गई है, लेकिन IIT बॉम्बे ने मौजूदा ढांचे पर अतिरिक्त निर्माण की व्यवहार्यता को लेकर चिंता जताई है।

एलिवेटेड ट्रांजिट के लिए एक मानक निकासी प्रोटोकॉल का न होना एक बड़ी चूक है, जहाँ यात्री सुरक्षा से ऊपर परिचालन लॉन्च को प्राथमिकता दी गई।

एक अन्य विकल्प 'रेस्क्यू रेक' का उपयोग करना है—यानी विपरीत लाइन पर एक दूसरी ट्रेन तैनात करना, जिससे फंसे हुए यात्रियों को एक अस्थायी पुल के जरिए स्थानांतरित किया जा सके। हालांकि यह तरीका पहले अपनाया गया है, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि यदि रेस्क्यू ट्रेन नहीं पहुँच पाती, तो एक बैकअप सिस्टम होना अनिवार्य है।

इसके अलावा, भीड़ के कारण तीखे मोड़ों पर ट्रेन के झुकने (tilt) के जोखिम का भी अध्ययन किया जा रहा है। चूंकि मोनोरेल को गाइडवे से बिजली मिलती है, इसलिए हल्का सा झुकाव भी विद्युत कनेक्शन को तोड़ सकता है, जिससे आपातकालीन दरवाजे नहीं खुलेंगे और एयर-कंडीशनिंग बंद हो जाएगी।

निकासी के अलावा, MMRDA इस बात की भी जांच कर रहा है कि एलिवेटेड ट्रैक के बीच के अंतराल को कैसे भरा जाए ताकि कोई वस्तु नीचे सड़क पर न गिरे। वडला और महलक्ष्मी जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में यह सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत आवश्यक है।

क्या आप जानते हैं?: मुंबई मोनोरेल भारत की पहली मोनोरेल प्रणाली थी, जिसे लास्ट-माइल कनेक्टिविटी के लिए बनाया गया था, लेकिन यह शुरुआत से ही तकनीकी खामियों और कम सवारी के कारण संघर्ष कर रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: जब सुरक्षा प्रमाणपत्र मिल चुके हैं, तो मोनोरेल क्यों नहीं खुल रही है?
ट्रेन और ट्रैक परिचालन के लिए सुरक्षित हैं, लेकिन 'इवैक्यूएशन प्लान' (आपात स्थिति में यात्रियों को बाहर निकालने की योजना) अभी तक अंतिम रूप से तैयार नहीं हुआ है।

प्रश्न 2: यात्रियों को बचाने के लिए क्या विकल्प सोचे गए हैं?
विकल्पों में ट्रैक के किनारे वॉकवे बनाना, रेस्क्यू ट्रेन का उपयोग करना और मैन-लिफ्ट का उपयोग करना शामिल है, हालांकि घने इलाकों में मैन-लिफ्ट का उपयोग कठिन है।