गुजरात के नर्मदा और सूरत जिलों के आदिवासी गांवों के बीच 3,000 एकड़ वन भूमि के मालिकाना हक को लेकर गंभीर विवाद छिड़ गया है। एक दुखद आपराधिक घटना ने इस पुराने भूमि विवाद को और अधिक हिंसक और जटिल बना दिया है।

  • नर्मदा के सगबारा और सूरत के उमरपाडा तालुकों के बीच 3,000 एकड़ वन भूमि पर विवाद।
  • 2024 में हुए एक बलात्कार और हत्या के मामले ने दोनों समुदायों के बीच तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है।
  • वन विभाग ने उपग्रह चित्रों (Satellite Imagery) के आधार पर सगबारा के दावों को खारिज किया है।
  • मामला अब गुजरात उच्च न्यायालय तक पहुँच चुका है।

गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में भूमि अधिकार एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है। नर्मदा जिले के सगबारा और सूरत जिले के उमरपाडा तालुकों के बीच करीब 3,000 एकड़ वन भूमि के उपयोग को लेकर संघर्ष चल रहा है। सगबारा के 12 आदिवासी गांवों के लोग पिछले 10 दिनों से रिले भूख हड़ताल कर रहे हैं, उनका दावा है कि वे पिछले दो दशकों से इस भूमि पर खेती कर रहे हैं।

विवाद की जड़ें गहरी हैं। सगबारा के ग्रामीणों का कहना है कि वे वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के तहत इस जमीन के हकदार हैं। दूसरी ओर, उमरपाडा के ग्रामीणों का तर्क है कि वे 1972 की उकाई बांध परियोजना के कारण विस्थापित हुए थे और यह भूमि उनका कानूनी अधिकार है। वर्तमान में, सूरत वन विभाग ने हिंसा रोकने के लिए दोनों क्षेत्रों के बीच बाड़ लगा दी है और पुलिस बल तैनात किया गया है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that this is not merely a land dispute but a volatile mix of administrative failure and social friction. The intersection of the Forest Rights Act (FRA) and historical displacement creates a legal vacuum that is easily exploited. When administrative boundaries are blurrier than the actual land use, local conflicts often escalate into inter-community violence, especially when triggered by criminal incidents.

वन अधिकार अधिनियम का उद्देश्य आदिवासियों को सशक्त बनाना था, लेकिन जब दस्तावेजी प्रमाणों और जमीनी हकीकत में अंतर होता है, तो यह अधिनियम विवाद का केंद्र बन जाता है।

इस विवाद में एक दुखद मोड़ जून 2024 में आया, जब क्षेत्र में एक नाबालिग के साथ बलात्कार और हत्या की घटना हुई। आरोपी की गिरफ्तारी सगबारा से होने के बाद, उमरपाडा के निवासियों ने सगबारा के लोगों को 'बाहरी' करार दिया और वन विभाग से उन्हें हटाने की मांग की। नवंबर 2024 में वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए सगबारा के किसानों को खेतों से बाहर कर दिया।

वन विभाग के सहायक संरक्षक गौरव लोढ़ा के अनुसार, उपग्रह चित्रों से यह सिद्ध नहीं होता कि सगबारा के ग्रामीण 2002 से वहां खेती कर रहे थे। वहीं, सगबारा के ग्रामीणों ने एक ग्राम सभा प्रस्ताव का हवाला दिया है, जिसे उमरपाडा के निवासियों ने फर्जी बताया है।

पक्षमुख्य दावाआधार
सगबारा (नर्मदा)20 साल से खेती कर रहे हैंवन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006
उमरपाडा (सूरत)विस्थापित समुदाय का अधिकार1972 उकाई बांध विस्थापन

इस मुद्दे पर राजनीतिक सरगर्मियां भी तेज हैं। भाजपा सांसद मनसुखभाई वसावा, कांग्रेस नेता तुषार चौधरी और अन्य आदिवासी नेताओं ने प्रदर्शनकारियों के प्रति एकजुटता जताई है, जिससे यह मुद्दा अब एक बड़े राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है।

क्या आप जानते हैं? वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के तहत, किसी भी व्यक्ति को भूमि का अधिकार तभी मिलता है जब वह 13 दिसंबर 2005 से पहले उस भूमि पर काबिज रहा हो।

Frequently Asked Questions

1. यह विवाद अचानक क्यों बढ़ गया?
हालांकि भूमि विवाद पुराना था, लेकिन जून 2024 में हुई एक बलात्कार और हत्या की घटना ने दोनों समुदायों के बीच आपसी विश्वास को खत्म कर दिया।

2. वन विभाग का इस पर क्या स्टैंड है?
वन विभाग का कहना है कि सैटेलाइट डेटा सगबारा के दावों का समर्थन नहीं करता है और भूमि उमरपाडा क्षेत्र के अंतर्गत आती है।